नई दिल्ली। राष्ट्रमंडल खेलों में सिर्फ 12 दिन का समय बचा है। इसके बावजूद कई योजनाएं अब तक पूरी नहीं हुई हैं। इससे चिंतित मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सोमवार को अधूरा काम पूरा करने के लिए संबंधित एजेंसियों को विशेष टीम गठित करने का निर्देश दिया है।
दीक्षित ने अपने शीर्ष अधिकारियों के साथ राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों का जायजा लेने के बाद सभी संबंधित एजेंसियों को जल्द से जल्द अधूरा काम पूरा करने के लिए कहा है। इन शीर्ष अधिकारियों में पीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी, एमसीडी, दिल्ली मेट्रो और दिल्ली जल बोर्ड तथा डिस्काम शामिल थे। इस बैठक में शिरकत करने वाले एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि उन्होंने सभी संबंधित एजेंसियों को एक विशेष टीम गठित करने का निर्देश दिया ताकि हालातों की समीक्षा की जा सके और अंतिम समय में होने वाली कमियों को पूरा किया जा सके। उन्होंने हालांकि काम की तारीफ करते हुए कहा, 'पिछले 15 दिन में भारी बारिश के कारण काम में ठीक प्रगति हुई है। शहर खेलों की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार है।
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प्रिय साथियों, पिछले दो वर्षों से आपके अमूल्य सहयोग के द्वारा आपकी टोटल स्टेट दिन प्रतिदिन प्रगति की ओर अग्रसर है ये सब कुछ जो हुआ है आपकी बदौलत ही संभव हो सका है हम आशा करते हैं कि आपका ये प्रेम व उर्जा हमें लगातार उत्साहित करते रहेंगे पिछलेे नवंबर अंक में आपके द्वारा भेजे गये पत्रों ने हमें और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित किया व हमें हौसलां दिया इस बार दिसंबर अंक पर बहुत ही बढिय़ा लेख व आलेखों के साथ हम प्रस्तुत कर रहें हैं अपना अगला दिसंबर अंक आशा करते हैं कि आपको पसंद आएगा. इसी विश्वास के साथ
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राजकमल कटारिया
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Sunday, 21 November 2010
राष्ट्रमंडल के काम निपटाएंगे विशेष दल
दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर देश है भारत
वाशिंगटन। दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत को सलाम करते हुए अमेरिका की एक सरकारी रिपोर्ट ने हिंदुस्तान को दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर राष्ट्र घोषित किया है।
सबसे ताकतवर देशों की ताजा सूची में भारत का शुमार अमेरिका और चीन के बाद तीसरे सबसे शक्तिशाली देश के रूप में किया गया है। यह संभावना भी जाहिर की गई है कि उसका दबदबा वर्ष 2025 तक और बढ़ेगा।
नेशनल इंटेलीजेंस निदेशक कार्यालय की नेशनल इंटेलीजेंस काउंसिल तथा यूरोपीय संघ के इंस्टीट्यूट फार सिक्योरिटी स्टडीज [ईयूआईएसएस] ने 'ग्लोबल गवर्नेंस 2025' शीर्षक से रिपोर्ट जारी की है। अंतरराष्ट्रीय फ्यूचर्स माडल के मुताबिक वर्ष 2025 तक अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान तथा रूस की ताकत घटेगी, जबकि चीन, भारत तथा ब्राजील और शक्तिशाली हो जाएंगे।
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सबसे ताकतवर देशों की ताजा सूची में भारत का शुमार अमेरिका और चीन के बाद तीसरे सबसे शक्तिशाली देश के रूप में किया गया है। यह संभावना भी जाहिर की गई है कि उसका दबदबा वर्ष 2025 तक और बढ़ेगा।
नेशनल इंटेलीजेंस निदेशक कार्यालय की नेशनल इंटेलीजेंस काउंसिल तथा यूरोपीय संघ के इंस्टीट्यूट फार सिक्योरिटी स्टडीज [ईयूआईएसएस] ने 'ग्लोबल गवर्नेंस 2025' शीर्षक से रिपोर्ट जारी की है। अंतरराष्ट्रीय फ्यूचर्स माडल के मुताबिक वर्ष 2025 तक अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान तथा रूस की ताकत घटेगी, जबकि चीन, भारत तथा ब्राजील और शक्तिशाली हो जाएंगे।
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केवल गुड गवर्नेस ही है सत्ता में दोबारा वापिसी की गारंटी
अर्जुन शर्मा
आज अफ्गानिस्तान में अमेरिका व मित्र राष्ट्रों की सेनाएं पाकिस्तान को साथ लेकर लड़ रही हैं। इससे पूर्व रूस ने अफ्गानिस्तान पर आधिपत्य जमाने के चक्कर में आज आपस में लड़ रही सेनाओं का मिला जुला विरोध झेला था पर इतिहास गवाह है कि अफ्गानिस्तान पर आज तक दो ही शासक काबू पा सके हैं। पहला सिकंदर और दूसरे शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह।
एक इतिहास की बात पाठकों के साथ सांझी करता हूं। जब महाराजा रणजीत सिंह अफ्गानिस्तान पर काबिज हुए तो काबुल स्थित शिविर में उनका मुख्य रसोईया उनके सामने उपस्थित हुआ। उसने बयान किया कि रसोई भंडार से नमक और मिर्च मसाला खत्म हो गया है। महाराजा ने अपनी जेब से पैसे निकाल कर मुख्य रसोईये को विदा किया ताकि वो नमक-मसाला खरीद कर अपनी कमी पूरी कर सके। महाराजा के पास बैठे जरनैलों ने हैरान होते हुए महाराजा से प्रश्न किया कि ये देश जीत कर भी महाराजा नमक मसाले जैसी तुच्छ वस्तु के लिए पैसे जेब से देंगे? महाराजा का जवाब था कि यदि मैं अपने सैनिकों को बाजार से नमक मसाला लूटने की छूट दे दूंगा तो वे मेरे नाम पर सारा शहर लूट लेंगे। जिससे भी जवाब तलबी की जाएगी, उसका यही जवाब होगा कि जनाब मैने तो आपके आदेश का पालन करते हुए केवल नमक मसाला ही लूटा था, बाकी लूट किसने की उसकी मुझे कोई जानकारी नहीं। सो ऐसी अराजकता से शहर को बचाने के लिए यही पर्याप्त है कि नमक मसाला अपनी जेब से मंगवा कर किसी को कुछ भी लूटने की छूट न दूं।
यह घटना महाराजा के अपने मुल्क में नहीं बल्कि जीते गए देश की है जहां की जनता को परेशानी से बचाने के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने इतनी महानता व समझदारी दिखाई। तभी तो बरसों पहले घटी ये घटना इतिहास में दर्ज है व आप लोग इसे आज पढ़ कर महाराजा की सोच का आसानी से आकलन कर सकते हैं। इस घटना का प्रचार करने के लिए महाराजा रणजीत सिंह को कहीं विज्ञापन छपवाने की भी जरूरत नहीं पड़ी।
जो लोग महाराजा रणजीत सिंह जैसा शासन देने का सपना देखते हैं, उन्हें अच्छे व जन हितैषी शासकों के जीवन प्रसंग भी पढऩे चाहिएं व उन पर अमल करते हुए आम जनमानस की समस्याओं के प्रति सकारात्मक तथा आश्वासन के बजाए स्वंम अनुशासन से भरा नजरिया रखना चाहिए।
एक सज्जन ने पिछले दिनों तंज कंसते हुए कहा कि चंद्रमां पर पानी की तलाश करके छाती ठोंकने वालों को धरती पर पैदा हो रही पानी की समस्या पर भी विचार करना चाहिए। चांद पर पानी तलाश करने जैसे दुलर्भ काम को अंजाम देने वाले यदि धरती पर बिजली पैदा करने के और नए तरीके खोजते तो वो प्राप्ति ज्यादा व्यवहारिक होती। खैर ये विज्ञान की प्राप्ति से जुड़े मामले हैं जिनकी मुझे बहुत ज्यादा समझ नहीं है पर उस साधारण व्यक्ति की दलील तो वास्तव में कायल करने वाली ही लगी।
हमारा पंजाब जिसे सारे राष्ट्र में सबसे अधिक ऊर्जावान प्रदेश होने का गौरव हासिल होता रहा है, मौजूदा दौर में हवाई कल्पनाओं के कारण बहुत ज्यादा पिछड़ता प्रतीत हो रहा है। •ामीन से जुड़ी समस्याओं की तरफ ध्यान दिया जाए व शासन का एक मानवीय व अनुशासित चेहरा जनता के सामने पेश किया जाए तो सत्ता पाने या वापिस फिर से सत्ता पाने के लिए किसी मदारी जैसे तमाशे की जरूरत नहीं पड़ेगी।
पंजाब की धरती जिन गुरु साहिबान के नाम पर बसी है उन्होंने धर्म और सियासत को लेकर जो संदेश दिया है वो पावन दरबार साहिब व श्री अकाल तख्त साहिब के भवनों के निर्माण के सिद्धांत से ही झलकता है। हरिमंदर साहिब के भीतर किसी भी मंजिल व किसी भी कोने में बनी खिड़की को खोल कर देख लें तो श्री अकाल तख्त साहिब दिखाई नहीं पड़ते जबकि श्री अकाल तख्त साहिब की हर मंजिल व हर खिड़की से हरिमंदर साहिब के दर्शन होते हैं। इस प्रकार के निर्माण के पीछे गुरु साहिबान की दूरदृष्टि से निकला संकेत ये था कि सियासत करते समय (श्री अकाल तख्त साहिब सत्ता की शक्ति के प्रतीक हैं) हमेशा धर्म याद रहे ताकि सत्ता चलाने वाले हमेशा न्याय के रास्ते पर ही चलें जबकि धार्मिक गतिविधियों में लीन होते समय कभी भी सियासत दिखाई न पड़े। यदि यही माडल पंजाब की धरती पर पूरी इमानदारी से लागू हो जाए तो पंजाब देश का ही नहीं, दुनिया का सबसे ऊर्जावान प्रदेश हो सकता है।
इसके साथ आधुनिक युग में सत्ता की निरंतरता की मिसाल दी जाए तो नरेंद्र मोदी का गुजरात माडल, शिवराज सिंह चौहान का मध्य प्रदेश दर्शन व शीला दीक्षित का दिल्ली चिंतन अच्छी उदाहरण है। हालांकि हरियाणा में बहुत कठिनाई के बावजूद सत्ता में वापिस आए भुपेंद्र सिंह हुड्डा भी जवाबदेय प्रशासन के जनक तो साबित हुए ही हैं।
गुजरात में नरेंद्र मोदी ने बेहतरीन सड़कें (बिना टौल टैक्स वाली), बेमिसाल बिजली उत्पादन व जनता को जवाबदेय शासन दिया, तभी वे तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने, सारे देश में बनी खलनायक की छवि के बावजूद।
शिवराज सिंह चौहान अपनी सादगी व कम वायदे, ज्यादा काम के कारण मध्य प्रदेश की सत्ता पर दोबारा काबिज हुए। उन्होंने वायदे करते समय संयम व आत्म विश्लेषण को अपना हथियार बनाया व जनता को ये समझाने में कामयाब हुए कि जहां नेताओं को झूठे सपने नहीं दिखाने चाहिएं वहीं जनता को भी अपने प्रदेश की वित्तिय सीमाओं को समझते हुए धरातल पर घटित हो सकते विकास का ही सपना देखना चाहिए।
शीला दीक्षित ने जंगल जैसी अराजक तस्वीर वाली दिल्ली की सत्ता संभाल कर सबसे पहले दिल्ली की •ामीनी जरूरतों को समझा व उन पर पूरी तनदेही से काम किया। उन्होंने साबित किया कि विकास जैसा मुद्दा भी जनता को लुभाता है बशर्ते सचमुच विकास के प्रति सरकार की इमानदारी का संदेश सामान्य गति से जनता तक पहुंचे।
भुपेंद्र सिंह हुड्डा ने शरीफ व जन हितैषी सरकार का चेहरा हरियाणा वालों को दिखाया। उन्होंने अपने कौशल से विपक्ष के हाथ में कोई ठोस मुद्दा नहीं आने दिया जिसके चलते हुड्डा का तार्किक विरोध करने में विपक्ष कामयाब हो सके।
यदि पंजाब में पच्चीस साल शासन करने के दावे करने वालों को अगली बार घर नहीं बैठना तो •ामीन पर आकर अच्छे शासकों जैसी भूमिका पर आधारित राजनीति करें। पच्चीस के बजाए पचास साल तक राज करें, जनता को भला क्या तकलीफ होगी!
मिट्टी के कलात्मक बर्तन बनाने की कला में माहिर एक परिवार
अमित यायावर
पंजाब के अबोहर उपमंडल के राजस्थान की सीमा पर बसे गाँव खुइआ सरवर का एक परिवार मिट्टी के कलात्मक बर्तन बनाने में माहिर है. इस परिवार का पुश्तैनी धंधा मिट्टी के बर्तन बनाना है.बदलते समय के अनुसार इस परिवार ने अपने परम्परागत धंधे को नया रूप देकर अधिक आकर्षक और लाभदायक बना दिया. आज स्थिति यह है कि इस परिवार की कलाकृतिया बड़े अफसरों और व्यापारिक परिवारों के ड्राइंग रूम, बेड रूम और दफ्तरों की शोभा बढ़ा रही है. खुइआ सरवर के कुम्हार बिरादरी से सम्बन्धित दो भाईयो मनी राम और राम लाल ने अपने बर्तन बनाने के काम को नया रूप देने की शुरुआत की. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फ़ैल गयी. सेना और सिविल प्रशासन के अधिकारी उनकी कलात्मक कृतियों के दीवाने हो गए. मनी राम के निधन के बाद उनके पुत्र हीरा लाल और पुत्रवधू गीता रानी ने इस काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली.
टोटल स्टेट से बात करते हुए हीरा लाल ने बताया कि यह एक पारिवारिक काम है. परिवार का हरेक सदस्य इसमें योगदान डालता है. इस धंधे में कमाई से ज्यादा आत्म संतुष्टि की प्राप्ति होती है. वे अपने स्तर पर ही इन कलाकृतियों को सीधे कला के पारखी लोगो को बेचते है. बड़े स्तर पर इनके उत्पादन और मंडीकरण का उनका कोई इरादा नहीं है. गीता रानी ने बताया कि उसने यह कला ससुराल में अपनी सास से सीखी थी. वह इसमें अधिक बारीकी और निखार लाने का प्रयास कर रही है. उसने बताया कि किसी के तारीफ करने पर जिस संतुष्टि का अनुभव होता है, उसको पैसे से नहीं तोला जा सकता. गीता का कहना है कि आज के युग में हरेक औरत के हाथ में ऐसा कोई गुण अवश्य होना चाहिए जिससे वह अपने परिवार की आर्थिक उन्नति में योगदान दे सके.
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खेलकूद से वंचित गरीब बच्चे
अलका आर्य
खेलों की चर्चा में मशगूल रहने वाला महानगर का मध्यम, उच्च वर्गीय तबका अक्सर अपने आस-पास या थोड़ी दूरी पर बसी बस्तियों के बच्चों की खेल की बाबत चर्चा नहीं करता.
स्थानीय प्रशासन/सरकार को भी इसकी ज्यादा फिक्र नहीं है. इधर विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी का मानना है कि खेलों को प्रोत्साहित करने की दिशा में पहला कदम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार हर बच्चे को खेल मैदान, बढिय़ा खेल उपकरण व कोचिंग मुहैया कराए. यह सब हमारे पास नही है. यह सच है कि अपने देश में खेलों को प्रोत्साहित करने के लिए उसके बुनियादी ढांचे पर अधिक रकम न खर्च करने की प्रवृत्ति आज भी कायम है.
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि शहरी मध्यम व उच्च वर्ग के बच्चों के पास क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन जैसे खेल खेलने की सुविधा उपलब्ध है. वे जिस स्कूल में पढऩे जाते हैं, वहां इनडोर व आउट डोर गेम्स के लिए स्पेस होता है। शाम को वे किसी प्राइवेट कोचिंग सेंटर में जाकर अपनी खेल प्रतिभा को और निखार सकते हैं. मगर इस सरकारी उदासीनता व गैरबराबरी के ढांचे पर टिके इस समाज में बस्तियों में रहने वाले हजारों बच्चों/नवकिशोरों के हिस्से खेल के नाम पर क्या मिलता है, यह जानना भी जरूरी है. जिन सरकारी स्कूलों में वे पढ़ते हैं, वहां पढ़ाई का बुनियादी ढांचा तक उपलब्ध नहीं, कहीं विद्यार्थी अधिक तो क्लास रूम छोटे, कहीं टेंट ही क्लास रूम हैं. ऐसे में खेल को कौन तवज्जो देगा. ये बच्चे जिन बस्तियों में रहते हैं, वहां नगर प्रशासन ने छोटे-छोटे पार्क बनाकर अपना खेल दायित्व पूरा कर लिया है. मगर इन पार्कों की हालत यह है कि बस्ती के आवारा पुरुष दिन में ही वहां जुआ खेलते हैं, शराबी जुटते हैं, लोग कूडा फेंकते हैं.
दिल्ली की एक पुनर्वास बस्ती मदनगीर खादर में छठी क्लास में पढऩे वाले एक बच्चे ने बताया कि वह व उसके कई दोस्त फुटबाल खेलना चाहते हैं, पर कहां खेले व कौन उन्हें सिखाएगा. उस जैसे अनेक बच्चे ऐसे कई सवाल आपसे पूछ सकते हैं. दिल्ली के ऐसे बच्चों को खेल की बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के मकसद से 'हम भी खेलेंगे-पर कहां व कैसेÓ नामक एक अभियान पिछले महीने शुरू किया गया. हाशिए के इन बच्चों के लिए यह विचार दिहाड़ी, आश्रय, शिक्षा, निर्माण मजदूरों व बेसहारा लोगों की समस्याओं पर लंबे समय से एक समझ विकसित करने वाले लोगों के दिमाग की उपज है. मोबाइल क्रैच, अंकुर, सैंटर फॅार एडवोकेसी व रिसर्च और जागोरी ने मिलकर इस अभियान की शुरूआत की और नीति निर्माताओं का ध्यान इस मुददे की ओर आकृष्ट किया.
दिल्ली की ही एक बस्ती में रहने वाली कुछ लड़कियों ने मायूसी भरे लहजे में बताया कि लड़कियों की जिंदगी से खेल लगभग गायब हो चुका है. लड़के फिर भी कभी-कभार खेलते नजर आ जांएगे, चाहे वह जगह असुरक्षित छत हो या सड़क. मगर लड़कियां नजर नहीं आती. गौरतलब है कि अपने देश में महिला खिलाड़ी बहुत कम हैं. उन्हें इस दिशा में खास प्रोत्साहन पैकेज की दरकार है. बस्तियों में रहने वाली लड़कियां खेलों में क्यों पीछे रह जाती हैं, इस ओर ध्यान देना होगा. सरकारी व छोटे प्राइवेट स्कूलों में खेल की सुविधा न के बराबर होती है. अक्सर अध्यापक व अभिभावक भी उन्हें इस दिशा में दिलचस्पी पैदा करने में खास रुचि नहीं दिखाते. वे इस सोच के शिकार होते हैं कि लड़कियां खेलकर क्या करेंगी. शादी के बाद अपने घर चली जाएंगी, वहां खेलने का वक्त कहां मिलेगा. एक तरफ वे इस पिछड़ी सोच के शिकार हैं तो दूसरी तरफ आवारा पुरुषों के ठिकानों में तब्दील हो चुके बस्तियों के पार्कों का माहौल रुकावट बनता है.
हाल में देश के 15 बड़े शहरों (जिसमें दिल्ली भी शमिल है) में एक सर्वेक्षण किया गया, जिससे यह पता चला कि शहरी इलाकों के वंचित तबके के विद्यार्थियों को आउटडोर गतिविधियों के लिए स्पेस नहीं मिलता. 5 से 9 आयु वर्ग के बच्चों की हेल्थ व फिटनेस में बहुत सुधार हो सकता है, अगर उन्हें खेलने के मौके नियमित उपलब्ध कराए जाएं. यह कैसा विकास है, जहां वंचित तबके के बच्चों के लिए खेल के मैदान तक नहीं हैं. अगर कहीं है तो उनकी हालत बेहद खराब है. खेलना बच्चे का स्वभाव है औेर खेल की सुविधा प्रदान करना सरकार का दायित्व. सरकार खेल मैदान, खेल उपकरणों की देख-रेख की जिम्मेदारी से मुहं नहीं फेर सकती. समुचित सुविधाओं व सिस्टम के अभाव में तमाम बाल प्रतिभाएं असमय दम तोड़ देती हैं. अपने देश को चीन की ओर न सिर्फ आर्थिक तरक्की के लिए देखना होगा बल्कि खेल प्रबंधन के गुर भी सीखने होंगे. वहां के स्पोट्र्स स्कूलों में करीब दो लाख पेशेवर एथलीटों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि खेलों के पुनरुत्थान के लिए सरकार को प्रतिबद्धता दिखानी होगी, जिसमें हाशिए के बच्चे भी शमिल हों.total state
हिंदी सिनेमा के अरमान
प्रमोद सिंह
आखिर क्या वज़ह है हिंदी सिनेमा के अरमान इतने फिसड्डी, इतने दो कौड़ी के हैं? ऐसा क्यों होता है कि 'रंग दे बसंती के कलरफुल फ्लाइट के ठीक अगले कदम वह 'दिल्ली 6 के दिशाहारे मैदान में जाकर ढ़ेर हो जाता है? सिनेमा की अपनी आंतरिक है या यह हिंदी संसार के सपना देख पाने की कूवत के भयावह दलिद्दर की दास्तान है? क्योंकि ऐसे ही नहीं होगा कि पूरी आधी सदी में एक 'परती परिकथा, एक 'आधा गांव के साहित्य और आधे 'राग दरबारी के एंटरटेनमेंट के दम पर एक पूरा समाज अपनी ठकुर सुहाती गाता, ऐंठ के गुमान में इतराता होगा?
उसकी अपनी ज़बान में अंतर्राष्ट्रीय तो क्या राष्ट्रीय ख्याति का भी कोई अर्थशास्त्री, इतिहासकार, समाजशास्त्री क्यों नहीं सोचता, वह कभी नहीं लजाता? इसलिए कि लोगों को वही सरकार मिलती है जितना पाने के वह काबिल होते हैं? हिंदी का साहित्यकार भी हमें उतना ही साहित्य देता है जितने की राजा राममोहन राय लाइब्रेरी खरीदी कर सके? सौ लोग लेखक को लेखक मानकर पहचानने लगें, साहित्य अकादमी रचना-पाठ के लिए उसे बुला सके, शिमला या बीकानेर की कोई कृशकाय कन्या एक भटके, आह्लादकारी क्षणों में लेखक की तारीफ़ में तीन पत्र लिख मारे कि फिर लेखक उसे पटा सके, आगे का अपना चिरकुट जीवन खुशी-खुशी चला सके?
चंद तिलकुट पुरस्कार और इससे ज़्यादा हिंदी का लेखक यूं भी कहां कुछ चाहता है? अरस्तु और वाल्तेयर बनने के तो उसके अरमान नहीं ही होते, वॉल्तेयर बेन्यामिन बनने का तो वह अपने दु:स्वप्न में भी नहीं सोचता, फिर हिंदी सिनेमा ही ऐसी क्यों बौड़म हो कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारे?
साहित्य को तो साहित्यकार के यार लोग ही हैं जो अपने सिर लिए रहते हैं, हिंदी सिनेमा की दिलदारी का तो व्यापक विस्तार भी है, देश में ही नहीं, समुंदरों पार भी है. बिना कुछ किए, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का हलकान गा-गाकर ही वह सफल बनी हुई है, तो ख्वामख्वाह अपनी सफलता का फॉर्मूला वह क्यों बिगाड़े? चौदह सौ लोगों के बीच के हिंदी साहित्य तक ने जब रिस्क नहीं लिया तो चालीस करोड़ों के बीच घूमनेवाला हिंदी सिनेमा किस सामाजिकता की गरज में अपना बना-बनाया धंधा खराब करे? कोई तुक है? नहीं है.
जाति को भूलें, गरीबी याद रखें
डॉ वेदप्रताप वैदिक
मुझें दो बातों की बड़ी खुशी है. एक तो यह कि जातीय गणना के इरादे को देश सफ़ल चुनौती दे रहा है. जबसे संबल भारत ने मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन छेड़ा है, इसका समर्थन बढ़़ता ही चला जा रहा है. देश के वरिष्ठतम नेता, न्यायाधीश, विधिशास्त्री, विद्वान, पत्रकार, समाजसेवी और अन्य लोग भी इससे जुड़ते चले जा रहे हैं. इसमें सभी प्रांतों, भाषाओं, जातियों, धर्मों और धंधों के लोग हैं. ऐसा नहीं लगता कि यह मु_ीभर बुद्धिजीवियों का बुद्धि-विलास भर है.
दूसरी खुशी यह है कि जो लोग हमारे आंदोलन का विरोध कर रहे हैं, वे भी यह बात बराबर कह रहे हैं कि वे भी जात-पांत विरोधी हैं. वे जनगणना में जाति को इसीलिए जुड़वाना चाहते हैं कि इससे आगे जाकर जात-पांत खत्म हो जाएगी. कैसे खत्म हो जाएगी, यह बताने में वे असमर्थ हैं. जातीय जनगणना के पक्ष में जो तर्क वे देते हैं, वे इतने कमज़ोर हैं कि आप उनका जवाब न दें तो भी वे अपने आप ही गिर जाते हैं.
फिऱ भी उन सज्जनों के साहस की दाद देनी होगी कि वे जातिवाद की खुलेआम निंदा कर रहे हैं. जनगणना में जात को जोडऩा ऐसा ही है, जैसे बबूल का पेड़ बोना और उस पेड़ से आम खाने का इंतजार करना! हर व्यक्ति से जब आप उसकी जात पूछेंगे और उसे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करेंगे तो क्या वह अपनी जात हर जगह जताने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा? उसकी व्यक्तिश: पहचान तो दरी के नीचे सरक जाएगी और उसकी जातीय पहचान गद्दी पर जा बैठेगी.
क्या पाठशाला-प्रवेश, क्या नौकरी, क्या पदोन्नति, क्या यारी दोस्ती, क्या काम-धंधा, क्या राजनीति, क्या सामाजिक-जीवन सभी लोगों को क्या उनकी जात से नहीं पहचाना जाएगा और क्या वही उनके अस्तित्व का मुख्य आधार नहीं बन जाएगी? आज भी जात खत्म नहीं हुई है. वह है, लेकिन उसका दायरा शादी-ब्याह तक सिमट गया है. अब दफ्तर, रेल, अस्पताल या होटल में कोई किसी की जात नहीं पूछता. सब सबके हाथ का खाना खाते हैं और शहरों में अब शादी में भी जात के बंधन टूट रहे हैं.
यदि जनगणना में हम जात को मान्यता दे देंगे तो दैनंदिन जीवन में उसे अमान्य कैसे करेंगे? जनगणना में पहुंचकर वह घटेगी या बढ़ेगी. शादी के अलावा जात अगर कहीं जिंदा है तो वह राजनीति में है. जब राजनीतिक दलों और नेताओं के पास अपना कोई शानदार चरित्र नहीं होता, सिद्धांत नहीं होता, व्यक्तित्व नहीं होता, सेवा का इतिहास नहीं होता तो जात ही उनका बेड़ा पार करती है. जात मतदाताओं की बुद्धि हर लेती है. वे किसी भी मुद्दे का निर्णय उचित-अनुचित या शुभ-अशुभ के आधार पर नहीं, जात के आधार पर करते हैं.
जैसे भेड़-बकरियां झुंड में चलती हैं वैसे ही मतदाता भी झुंड-मनोवृत्ति से ग्रस्त हो जाते हैं. दूसरे अर्थों में राजनीतिक जातिवाद मनुष्यों को मवेशी बना देता है. क्या यह मवेशीवाद हमारे लोकतंत्र को जिंदा रहने देगा. जातिवाद ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ें पहले से ही खोद रखी हैं. अब हमारे जातिवादी नेता जनगणना में जाति को घुसवाकर हमारे लोकतंत्र को बिल्कुल खोखला कर देंगे. जैसे हिटलर ने नस्लवाद का भूत जगाकर जर्मन जनतंत्र को खत्म कर दिया, वैसे ही हमारे जातिवादी नेता भारतीय लोकतंत्र को तहस-नहस कर देंगे.
नस्लें तो दो थीं, जातियां तो हजारों हैं. भारत अगर टूटेगा तो वह शीशे की तरह टूटेगा. उसके हजारों टुकड़े हो जाएंगे. वह ऊपर से एक दिखेगा लेकिन उसका राष्ट्रभाव नष्ट हो जाएगा. नागरिकों के सामने प्रश्न खड़ा होगा-राष्ट्र बड़ा कि जात बड़ी? यह कहनेवाले कितने होंगे कि राष्ट्र बड़ा है. दलितों और पिछड़ों के जातिवादी नेताओं को यह गलतफ़हमी है कि जातिवाद फ़ैलाकर वे बच निकलेंगे. वे क्यों भूल जाते हैं कि उनकी हरकतें जवाबी जातिवाद को जन्म देंगी? जनगणना के सवाल पर ही यह प्रक्रिया शुरु हो गई है.
कई सवर्ण नेताओं ने मुझे गुपचुप कहा कि जातीय गणना अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि उससे बहुत से जाले साफ़ हो जायेंगे. सबसे पहले तो यह गलतफ़हमी दूर हो जायेगी कि देश में सवर्ण लोग सिफऱ् 15 प्रतिशत हैं. ताजातरीन राष्ट्रीय सेंपल सर्वे के अनुसार सवर्णों की संख्या लगभग 35 प्रतिशत है और पिछड़ी जातियों की 41 प्रतिशत! यदि इन जातियों में से मलाईदार परतों को अलग कर दिया जाये और वास्तविक गरीबों को गिना जाये तो उनकी संख्या शायद सवर्णों से भी कम निकले. ऐसी हालत में उन्हें अभी जो आरक्षण मिल रहा है, उसे घटाने की मुहिम चलाई जाएगी.
1931 की अंतिम जातीय गणना ने तथाकथित पिछड़ी जातियों की संख्या 52 प्रतिशत बताई थी. इसी आधार पर उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण मिल गया. तो क्या अब उसे घटाकर 20 या 22 प्रतिशत करना होगा? इसके अलावा जातीय जनगणना हुई तो आरक्षण प्राप्त जातियों में जबर्दस्त बंदरबांट शुरू हो जाएगी. सभी जातियों के अंदर उप-जातियां और अति-उपजातियां हैं. वे भी अपना हिस्सा मांगेंगी. जो नेता जातीय गणना की मांग कर रहे हैं, उनके छक्के छूट जाएंगे, क्योंकि प्रभावशाली खापों के विरुद्ध बगावत हो जाएगी. उनकी मुसीबत तब और भी बढ़ जाएगी, जब जाट और गुर्जर जैसी जातियां सारे भारत में आरक्षण के लिए खम ठोकने लगेंगी.
उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत बांध रखी है. इस 50 प्रतिशत को लूटने-खसोटने के लिए अब 500 से ज्यादा जातीय दावेदार खड़े हो जाएंगे. अगर जातीय गणना हो गई तो आरक्षण मजाक बनकर रह जाएगा. कौन नहीं चाहेगा कि उसे मुफ्त की मलाई मिल जाए? जातीय गणना निकृष्ट जातिवाद को पनपाएगी. जो वास्तव में गरीब हैं, उन्हें कोई नहीं पूछेगा लेकिन जिन जातियों के पास संख्या-बल और डंडा-बल है, वे मलाई पर हाथ साफ़ करेंगी.
इस लूट-खसोट में वे मुसलमान और ईसाई भी तत्पर होना चाहते हैं, जो जातीय-अभिशाप से बचने के लिए धर्मांतरित हुए थे. जो लोग जातीय गणना के पक्षधर हैं, उनसे कोई पूछे कि आप ओखर यह चाहते क्यों हैं? आप गरीबी हटाना चाहते हैं या जात जमाना चाहते हैं? यदि गरीबी हटाना चाहते हैं तो गरीबी के आंकड़े इक_े कीजिए. यदि गरीबी के आंकड़े इक_े करेंगे तो उसमें हर जात का गरीब आ जाएगा. कोई भी जात नहीं छूटेगी.
लेकिन सिफऱ् जात के आंकड़े इक_े करेंगे तो वे सब गरीब छूट जाएंगे, जिनकी जाति आरक्षित नहीं है. भारत में एक भी जात ऐसी नहीं है, जिसके सारे सदस्य गरीब हों या अमीर हों. जिन्हें हम पिछड़ा वर्ग कहते हैं, उनके लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने पुश्तैनी काम-धंधे छोड़ दिए हैं. उनका वर्ग बदल गया है, फिऱ भी जात की वजह से हम उन्हें पिछड़ा मानने पर मजबूर किये जाते हैं. क्या आंबेडकर, अब्दुल कलाम, केआर नारायण, मायावती, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद पिछड़े हैं? यह लोग अगड़ों से भी अगड़े हैं. क्या टाटा को कोई लुहार कहता है? क्या बाटा को कोई चमार कहता है? क्या कमोड बनानेवाली हिंदवेयर कंपनी को कोई भंगी कहता है? जातीय गणना चलाकर हम इतिहास के पहिए को पीछे की तरफ़ मोडऩा चाहते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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मुझें दो बातों की बड़ी खुशी है. एक तो यह कि जातीय गणना के इरादे को देश सफ़ल चुनौती दे रहा है. जबसे संबल भारत ने मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन छेड़ा है, इसका समर्थन बढ़़ता ही चला जा रहा है. देश के वरिष्ठतम नेता, न्यायाधीश, विधिशास्त्री, विद्वान, पत्रकार, समाजसेवी और अन्य लोग भी इससे जुड़ते चले जा रहे हैं. इसमें सभी प्रांतों, भाषाओं, जातियों, धर्मों और धंधों के लोग हैं. ऐसा नहीं लगता कि यह मु_ीभर बुद्धिजीवियों का बुद्धि-विलास भर है.
दूसरी खुशी यह है कि जो लोग हमारे आंदोलन का विरोध कर रहे हैं, वे भी यह बात बराबर कह रहे हैं कि वे भी जात-पांत विरोधी हैं. वे जनगणना में जाति को इसीलिए जुड़वाना चाहते हैं कि इससे आगे जाकर जात-पांत खत्म हो जाएगी. कैसे खत्म हो जाएगी, यह बताने में वे असमर्थ हैं. जातीय जनगणना के पक्ष में जो तर्क वे देते हैं, वे इतने कमज़ोर हैं कि आप उनका जवाब न दें तो भी वे अपने आप ही गिर जाते हैं.
फिऱ भी उन सज्जनों के साहस की दाद देनी होगी कि वे जातिवाद की खुलेआम निंदा कर रहे हैं. जनगणना में जात को जोडऩा ऐसा ही है, जैसे बबूल का पेड़ बोना और उस पेड़ से आम खाने का इंतजार करना! हर व्यक्ति से जब आप उसकी जात पूछेंगे और उसे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करेंगे तो क्या वह अपनी जात हर जगह जताने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा? उसकी व्यक्तिश: पहचान तो दरी के नीचे सरक जाएगी और उसकी जातीय पहचान गद्दी पर जा बैठेगी.
क्या पाठशाला-प्रवेश, क्या नौकरी, क्या पदोन्नति, क्या यारी दोस्ती, क्या काम-धंधा, क्या राजनीति, क्या सामाजिक-जीवन सभी लोगों को क्या उनकी जात से नहीं पहचाना जाएगा और क्या वही उनके अस्तित्व का मुख्य आधार नहीं बन जाएगी? आज भी जात खत्म नहीं हुई है. वह है, लेकिन उसका दायरा शादी-ब्याह तक सिमट गया है. अब दफ्तर, रेल, अस्पताल या होटल में कोई किसी की जात नहीं पूछता. सब सबके हाथ का खाना खाते हैं और शहरों में अब शादी में भी जात के बंधन टूट रहे हैं.
यदि जनगणना में हम जात को मान्यता दे देंगे तो दैनंदिन जीवन में उसे अमान्य कैसे करेंगे? जनगणना में पहुंचकर वह घटेगी या बढ़ेगी. शादी के अलावा जात अगर कहीं जिंदा है तो वह राजनीति में है. जब राजनीतिक दलों और नेताओं के पास अपना कोई शानदार चरित्र नहीं होता, सिद्धांत नहीं होता, व्यक्तित्व नहीं होता, सेवा का इतिहास नहीं होता तो जात ही उनका बेड़ा पार करती है. जात मतदाताओं की बुद्धि हर लेती है. वे किसी भी मुद्दे का निर्णय उचित-अनुचित या शुभ-अशुभ के आधार पर नहीं, जात के आधार पर करते हैं.
जैसे भेड़-बकरियां झुंड में चलती हैं वैसे ही मतदाता भी झुंड-मनोवृत्ति से ग्रस्त हो जाते हैं. दूसरे अर्थों में राजनीतिक जातिवाद मनुष्यों को मवेशी बना देता है. क्या यह मवेशीवाद हमारे लोकतंत्र को जिंदा रहने देगा. जातिवाद ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ें पहले से ही खोद रखी हैं. अब हमारे जातिवादी नेता जनगणना में जाति को घुसवाकर हमारे लोकतंत्र को बिल्कुल खोखला कर देंगे. जैसे हिटलर ने नस्लवाद का भूत जगाकर जर्मन जनतंत्र को खत्म कर दिया, वैसे ही हमारे जातिवादी नेता भारतीय लोकतंत्र को तहस-नहस कर देंगे.
नस्लें तो दो थीं, जातियां तो हजारों हैं. भारत अगर टूटेगा तो वह शीशे की तरह टूटेगा. उसके हजारों टुकड़े हो जाएंगे. वह ऊपर से एक दिखेगा लेकिन उसका राष्ट्रभाव नष्ट हो जाएगा. नागरिकों के सामने प्रश्न खड़ा होगा-राष्ट्र बड़ा कि जात बड़ी? यह कहनेवाले कितने होंगे कि राष्ट्र बड़ा है. दलितों और पिछड़ों के जातिवादी नेताओं को यह गलतफ़हमी है कि जातिवाद फ़ैलाकर वे बच निकलेंगे. वे क्यों भूल जाते हैं कि उनकी हरकतें जवाबी जातिवाद को जन्म देंगी? जनगणना के सवाल पर ही यह प्रक्रिया शुरु हो गई है.
कई सवर्ण नेताओं ने मुझे गुपचुप कहा कि जातीय गणना अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि उससे बहुत से जाले साफ़ हो जायेंगे. सबसे पहले तो यह गलतफ़हमी दूर हो जायेगी कि देश में सवर्ण लोग सिफऱ् 15 प्रतिशत हैं. ताजातरीन राष्ट्रीय सेंपल सर्वे के अनुसार सवर्णों की संख्या लगभग 35 प्रतिशत है और पिछड़ी जातियों की 41 प्रतिशत! यदि इन जातियों में से मलाईदार परतों को अलग कर दिया जाये और वास्तविक गरीबों को गिना जाये तो उनकी संख्या शायद सवर्णों से भी कम निकले. ऐसी हालत में उन्हें अभी जो आरक्षण मिल रहा है, उसे घटाने की मुहिम चलाई जाएगी.
1931 की अंतिम जातीय गणना ने तथाकथित पिछड़ी जातियों की संख्या 52 प्रतिशत बताई थी. इसी आधार पर उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण मिल गया. तो क्या अब उसे घटाकर 20 या 22 प्रतिशत करना होगा? इसके अलावा जातीय जनगणना हुई तो आरक्षण प्राप्त जातियों में जबर्दस्त बंदरबांट शुरू हो जाएगी. सभी जातियों के अंदर उप-जातियां और अति-उपजातियां हैं. वे भी अपना हिस्सा मांगेंगी. जो नेता जातीय गणना की मांग कर रहे हैं, उनके छक्के छूट जाएंगे, क्योंकि प्रभावशाली खापों के विरुद्ध बगावत हो जाएगी. उनकी मुसीबत तब और भी बढ़ जाएगी, जब जाट और गुर्जर जैसी जातियां सारे भारत में आरक्षण के लिए खम ठोकने लगेंगी.
उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत बांध रखी है. इस 50 प्रतिशत को लूटने-खसोटने के लिए अब 500 से ज्यादा जातीय दावेदार खड़े हो जाएंगे. अगर जातीय गणना हो गई तो आरक्षण मजाक बनकर रह जाएगा. कौन नहीं चाहेगा कि उसे मुफ्त की मलाई मिल जाए? जातीय गणना निकृष्ट जातिवाद को पनपाएगी. जो वास्तव में गरीब हैं, उन्हें कोई नहीं पूछेगा लेकिन जिन जातियों के पास संख्या-बल और डंडा-बल है, वे मलाई पर हाथ साफ़ करेंगी.
इस लूट-खसोट में वे मुसलमान और ईसाई भी तत्पर होना चाहते हैं, जो जातीय-अभिशाप से बचने के लिए धर्मांतरित हुए थे. जो लोग जातीय गणना के पक्षधर हैं, उनसे कोई पूछे कि आप ओखर यह चाहते क्यों हैं? आप गरीबी हटाना चाहते हैं या जात जमाना चाहते हैं? यदि गरीबी हटाना चाहते हैं तो गरीबी के आंकड़े इक_े कीजिए. यदि गरीबी के आंकड़े इक_े करेंगे तो उसमें हर जात का गरीब आ जाएगा. कोई भी जात नहीं छूटेगी.
लेकिन सिफऱ् जात के आंकड़े इक_े करेंगे तो वे सब गरीब छूट जाएंगे, जिनकी जाति आरक्षित नहीं है. भारत में एक भी जात ऐसी नहीं है, जिसके सारे सदस्य गरीब हों या अमीर हों. जिन्हें हम पिछड़ा वर्ग कहते हैं, उनके लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने पुश्तैनी काम-धंधे छोड़ दिए हैं. उनका वर्ग बदल गया है, फिऱ भी जात की वजह से हम उन्हें पिछड़ा मानने पर मजबूर किये जाते हैं. क्या आंबेडकर, अब्दुल कलाम, केआर नारायण, मायावती, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद पिछड़े हैं? यह लोग अगड़ों से भी अगड़े हैं. क्या टाटा को कोई लुहार कहता है? क्या बाटा को कोई चमार कहता है? क्या कमोड बनानेवाली हिंदवेयर कंपनी को कोई भंगी कहता है? जातीय गणना चलाकर हम इतिहास के पहिए को पीछे की तरफ़ मोडऩा चाहते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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एक गैरजरूरी भाषण
गुंजेश
13 अगस्त, जिस समय देशभर के सिनेमा घरों में पिपली लाइव दिखाई जा रही थी, शायद उसी समय पीएमओ कार्यालय प्रधानमंत्री के भाषण का अंतिम ड्राफ्ट तैयार कर रहा था. वही भाषण जिसे भारत के प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त की सुबह लालकिले की प्राचीर से दिया. 15 अगस्त को दिया जाने वाला भाषण आमतौर से एक रूटीन भाषण होता है, जिसे आजादी के बाद से हर साल भारत का प्रधानमंत्री पूरा कर देता है. यह युग सूचना का युग है.
ताकत उसी के पास होगी जिसके पास सूचना होगी. लेकिन साथ ही साथ यह विज्ञापन का भी युग है जहां सिफऱ् दावे ही दावे हैं. इसलिए सिफऱ् सूचनाएं ही नहीं बल्कि सूचनाओं के सही मायनों का भी संप्रेषण जरूरी है. इसलिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री ने जो सूचनाएं हमें दी हैं उनकी पड़ताल कर ली जाए. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक साल पहले की स्थिति से अब कि स्थिति पर संतोष जताते हुए कहा है कि हमने डटकर इन कठिन परिस्थितियों का मुकाबला किया.
आर्थिक विकास की दर दुनिया के ज्यादातर देशों से बेहतर रही. इससे हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती जाहिर होती है. साथ ही उन्होंने ने यह भी कहा कि हमारी बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गौर से सुनी जाती है. लेकिन, अभी हाल ही के दिनों में विदेश मामलों में हमें कई मोर्चो पर मुंह कि खानी पड़ी है. और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमारी पहचान अमेरिकी पिछलग्गू की ही बनी है.
पाकिस्तान से हम लगातार यह गुहार कर रहे हैं कि 26/11 के दोषियों को वह हमें सौंपे, यह करना तो दूर उलटे पाकिस्तान हम पर आतंक फ़ैलाने के आरोप लगा रहा है. हम कूटनीतिक स्तर पर भी उसे कोई करारा जबाब देने में असमर्थ रहे हैं. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में धर्म, प्रांत, जाति, और भाषा के नाम पर लोगों में फ़ूट पडऩे कि बात कही और और कहा कि मजबूतियों के बावजूद, आज हमारे सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं जिनसे हमें एक जुट होकर लडऩा होगा.
दिसंबर 1998 के आस-पास लिखे गये अपने एक लेख में समाजवादी लेखक किशन पटनायक लिखते हैं कि नये विचारों और नये शासर्् का आना रुक-सा गया है. शासर्् और विचार निर्माण का नियामक जब से अमेरिका हो गया है, इसमें पहले का औध्त्य तो रह गया है लेकिन उसकी गंभीरता खत्म हो गयी है. क्या इस बात के लक्षण हमें अपनी राजनीति और प्रधानमंत्री के भाषण में भी नहीं मिलते हैं? यह बात तो तय है कि धर्म, प्रांत, जाति, और भाषा के नाम पर लोगों में फ़ूट पड़ती है, लेकिन आज से 50-60 साल पहले जो समस्या भावनात्मक विद्वेष के कारण थी अब उसके गहरे आर्थिक- राजनीतिक कारण हैं, और पिछले दो दशकों में यही कारण महत्वपूर्ण भी रहे हैं.
क्या प्रधानमंत्री के पास उन आर्थिक-राजनीतिक कारणों से निपटने कि कोई योजना है? क्या सरकार ने कभी उन औजारों को तलाशने कि कोशिश कि है जिससे इस तरह की फ़ूट डाली जाती है. और ओर्थक उदारीकरण के बाद हमारे समाजों में एकजुटता की कितनी संभावना रह गयी है क्या इससे हमारे प्रधानमंत्री नावाकिफ़ हैं? कृषि पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कृषि विकास की दर को चार प्रतिशत तक पहुंचाने की इच्छा जतायी.
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ सालों में हमारी कृषि विकास की दर में काफ़ी बढोतरी हुई है. किसानी के क्षेत्र में उन्होंने तकनीकी बदलाव की जरूरत को महसूस किया और बताया कि इस उद्देश्य के लिए भारत में दक्षिण ऐशया बोरलाग संसथान की स्थापना की जायेगी. उन्होंने यह भी बताया कि गेहूं और धान के समर्थन मूल्य में कैसे वृद्धि हुई है. पिछले कुछ सालों किसानों की आत्महत्या को छोड़ भी दें तो किसानी छोड़ कर मजूरी अपनानेवाले किसानो कि संख्या काफ़ी बड़ी है, जिसके बारे में चिंता करने कि जरूरत है.
हमें यह समझना होगा की किसानी आज भी हमारे देश में उद्योग का रूप नहीं ले पायी है. इसकी मुख्य वजह है बुनियादी सुविधाओं का न होना और जब तक बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी किसी भी तरह का तकनीकी विकास रेत के महल जितना ही विश्वसनीय होगा. आतंरिक सुरक्षा पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने पहली पर स्वीकारा कि ओदवासियों के प्रति, सालों से बरती गयी लापरवाही इसके लिए जिम्मेदार है. उदारीकरण लागू करने वाले हमारे प्रधानमंत्री एक बड़ी आबादी जो आदिवासियों के रूप में जंगलों में रह रही है की इच्छाओं को नहीं समझ पा रहे हैं.
उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर के नागरिकों से प्रधानमंत्री ने यह अपील की कि वे लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से अपनी और देश की बेहतरी के लिए हमारे साथ मिल कर काम करें. कई अन्य विषयों पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी राय रखी लेकिन असल बात तो यही है की सरकार अब भी समस्याओं को जितने हल्के से ले रही है, और जिस भावनात्मक तरिके से उन्हें हल करने की मंशा रखती है वह दूरदर्शिता की परिचायक तो कतई नहीं हो सकती.
खबरों के अपराधी की सजा
विश्वनाथ सचदेव
दुनिया भर की आपराधिक गतिविधियों, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ लगातार ढोल पीटनेवाला हमारा मीडिया अपने ही घर के भ्रष्ट आचरण के बारे में एक आपराधिक चुप्पी साधे हुए है. पता नहीं अब कितनों को याद है कि लोकसभा के पिछले चुनावों और उसके बाद कुछ राज्यों में हुए चुनावों के दौरान देश के कुछ समाचार पत्रों और चैनलों पर पैसे लेकर खबरें छापने और पैसे लेकर खबरें न छापने के गंभीर आरोप लगे थे.
आरोपियों में कुछ बड़े अखबार भी शामिल थे. आरोपों के बारे में वे चुप रहे, लेकिन यह सबको पता चल गया था कि मीडिया बिकता है. छोटे- बड़े सब तरह के अखबारों में चुनाव में खड़े प्रत्याशियों के बारे में विज्ञापन खबरों के रुप में छापे गये. ÓखबरोंÓ के आकार प्रकार की दरें तय थीं. पैसा दीजिए, जितनी- जैसी खबर छपवानी है, छप जायेगी.प्रतिद्वंद्वी की ÓखबरेंÓनहीं छपने देनी हैं तो पैसा देकर आप उसे रुकवा सकते हैं. मीडिया की विश्वसनीयता पर इससे बड़ा खतरा कभी नहीं मंडराया था, इससे बड़ा हमला पहले कभी नहीं हुआ था.
कुछ शोर मचा. विश्वसनीयता को बचाने के लिए कुछ आवाजें उठी. सारे प्रकरण की जांच की मांग भी हुई. क हा गया कि इस अनैतिक आचरण को रोकने के लिए जरुरी कदम उठाये जायेंगे. प्रेस पर नजर रखने के लिए बनी संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया भी सक्रिय हुई. पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनायी गयी. कमेटी ने एक लंबी चौड़ी रिपोर्ट तैयार की. लगने लगा था कि अपनी विश्वसनीयता बचाने के लिए मीडिया कुछ गंभीर कदम उठायेगा, आरोपियों को अपना आचरण सुधारने के लिए कहा जायेगा, भविष्य में मीडिया की विश्वसनीयता बचाये रखने के लिए कुछ दिशा निर्देश तैयार किये जायेंगे. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.
प्रेस काउंसिल ने अपने द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट को ही दरकिनार कर दिया. इस रिपोर्ट में आरोपियों के नाम ही नहीं उजागर किये गये थे, उनके कारनामों का कच्चा चि_ा भी था. दो सदस्यीय समिति ने छत्तीस हजार शब्दों की रिपोर्ट तैयार की थी. यह रिपोर्ट यदि जनता के सामने आती तो कई मीडिया संगठन बेनकाब हो जाते. प्रेस काउंसिल में बैठे मीिंडया घरानों के प्रतिनिधियों को यह कैसे स्वीकार हो सकता था. तय किया गया कि इस रिपोर्ट को संदर्भ दस्तावेज के रुप में काउंसिल के रिकार्ड में रखा जायेÓ
और उचित कार्रवाई के लिए एक और रिपोर्ट तैयार की जाये. इसे फाइनल रिपोर्ट कहा गया. इसके लिए गठित उपसमिति ने मात्र छत्तीस सौ शब्दों की रिपोर्ट तैयार की है. खबरों के नाम पर विज्ञापन छापने वालों में से किसी का भी नाम इस रिपोर्ट में नहीं है. मूल रिपोर्ट के सारे संदर्भ गायब हैं. प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा और मीडिया के स्तर को सुधारने के लिए गठित प्रेस काउंसिल ने इस फाइनल रिपोर्ट के माध्यम से अपने अस्तित्व के औचित्य पर ही प्रश्न चि: लगा दिया है. पैसा लेकर खबर छापने की बात हमारे देश में नयी नहीं है.
पर पहले यह काम अक्सर छोटे अखबार करते थे. पर लोकसभा के पिछले चुनावो में और उसके बाद हुए महाराष्ट्र जैसे राज्यों के चुनावों में Óबड़े अखबारोंÓ और बड़े चैनल भी इस धंधे में लग गये. मामला संसद में भी उठा था. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इसे मीडिया की विश्वसनीयता और हमारी चुनाव प्रणाली की सार्थकता के लिए खतरनाक बताया था. इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि प्रेस काउंसिल के माध्यम से कुछ ठोस और सार्थक कार्रवाई हो सकेगी. होनी भी चाहिए थी. दांव पर मीडिया की विश्वसनीयता थी.
पर जो हुआ उसे शर्मनाक ही कहा जा सकता है-खबरों की जगह बेचने की घटना से कम शर्मनाक नहीं है यह बात. सवाल खबरें खरीदने-बेचने के अपराधियों के नाम उजागर करने का ही नहीं है, सवाल यह भी है कि इस काम के लिए नियुक्त समिति की विस्तृत रिपोर्ट को जनता के सामने आने देने से क्यों रोका गया? प्रेस काउंसिल की इस कार्रवाई से किसके स्वार्थ सधते हैं. सारे अखबार नहीं बिके थे, सारे समाचार चैनल भी नहीं बिके थे.
इसलिए यह और जरुरी था कि अपराधियों के चेहरे उजागर किये जायें, ताकि जनता को अपराधियों का पता तो चले ही, यह भी जानकारी हो कि सारी मीडिया दोषी नहीं है. पता नहीं किन दबावों में, और किनके दबावों में, प्रेस काउंसिल ने अपने ही द्वारा नियुक्त समिति की तथ्यों पर आधारित विस्तृत रिपोर्ट को मात्र संदर्भ के लिए रखना उचित समझा और जनता के सामने एक संक्षिप्त रिपोर्ट पेश करना, जिसमें अपराध का ब्यौरा तो है, पर अपराधियों काtotal state नहीं. यह आधा-अधूरा सच प्रेस काउंसिल के इरादों पर तो संदेह प्रकट करता ही है, प्रेस की विश्वसनीयता को बचाने के एक अवसर को खो देने का भी उदाहरण है.
अपराधियों के नाम उजागर न करने के पक्षधरों का तर्क यह बताया गया है कि प्रेस काउंसिल का उद्देश्य एक गलत प्रवृति को रोकना है, कुछ नाम उछालने से क्या लाभ मिलेगा?
देवदासियां अब नहीं रहेंगी दासी
अंजलि सिन्हा
अपनी पूर्वघोषित योजना के अनुसार महाराष्ट्र की देवदासियों ने इस साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुंबई में अपना अर्धनग्न प्रदर्शन किया. वे सरकार के सामने पहले ही अपनी मांगे कई बार रख चुकी हैं तथा विरोध प्रदर्शन कर चुकी हैं. उन्हें उम्मीद है कि अब इस अनोखे अर्धनग्न प्रदर्शन से सरकार दबाव में आ जायेगी और उनकी सुनवाई हो सकेगी. हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने अभी तक कोई आश्वासन नहीं दिया है. महाराष्ट्र में देवदासियों की संख्या अच्छी खासी है.
यह एक अलग ही प्रश्न है जो हमारे समाज की संरचना पर विचार करने के लिए मजबूर करता है कि इस जमाने में भी देवदासी प्रथा जीवित क्यों है. यह प्रथा जिसमें माना जाता है कि इन महिलाओं का विवाह भगवान् से हुआ है और वे उन्हीं की सेवा के लिए मंदिर के प्रांगण में रहती है. लेकिन हकीकत का सभी को पता है कि ये महिलायें निराश्रित की तरह और बदहाल होती हैं और भगवान जैसे निर्जीव चीज की सेवा में क्या करेंगी, उन्हें तो वहां के पुजारियों और मठाधीश की सेवा करनी पड़ती है.
यह शुद्ध रूप से धर्मक्षेत्र की वेश्यावृत्ति है जिसे धार्मिक स्वीकृति हासिल है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इन देवदासियों, जिन्हें जोगिनियां भी कहा जाता है के बच्चों की स्थिति का संज्ञान लिया और आंध्र प्रदेश सरकार से पूछा कि उसने इन बच्चों के कल्याण के लिए क्या किया है. 2007 में सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र मिला था जिसमें इन बच्चों की दुर्दशा को बयान किया गया था. और जिसे कोर्ट ने जनहित याचिका मान लिया था.
मानवाधिकार आयोग के 2004 के एक रिपोर्ट में इन देवदासियों के बारे में बताया गया है कि देवदासी प्रथा पर रोक के बाद वे देवदासियां नजदीक के इलाके में या शहरों में चली गयी जहां वे वेश्यावृत्ति के धंधें में लग गयी. 1990 के एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 45.9 प्रतिशत देवदासियां एक ही जिलें में वेश्यावृत्ति करती हैं तथा शेष अन्य रोजगार जैसे खेती-बाड़ी या उद्योगों में लग गयी. 1982 में कर्नाटक सरकार ने और 1988 में आंध्र प्रदेश सरकार ने देवदासी प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन लगभग कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 15 जिलों में अब भी यह प्रथा कायम है.
इस प्रथा को कई सारे दूसरे स्थानीय नाम से भी जाना जाता है. राष्ट्रीय महिला आयौग ने भी अपनी तरफ़ से पहल लेकर इन महिलाओं के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए राज्य सरकारों से सूचना मांगी. इसमें कई ने कहा कि उनके यहां यह प्रथा समाप्त हो चुकी है जैसे तमिलनाडू. ओडि़शा में बताया गया कि केवल पुरी मंदिर में एक देवदासी है. लेकिन आंध्र प्रदेश ने 16,624 देवदासियों का आंकड़ा पेश किया. महाराष्ट्र सरकार ने कोई जानकारी नहीं दी, जब महिला आयोग ने उनके लिए भत्ते का एलान किया तब आयोग को 8793 आवेदन मिले, जिसमें से 2479 को भत्ता दिया गया.
बाकी 6314 में पात्रता सही नहीं पायी गयी.मीडिया के एक हिस्से में 15 अगस्त को देवदासियों के इस अर्धनग्न प्रदर्शन की तुलना मणिपुर की महिलाओं द्वारा किये उस प्रदर्शन से की गयी जो उन्होंने वर्ष 2004 में असम राइफ़ल्स के दफ्तर के सामने किया था. थांगजाम मनोरमा नामक युवती के साथ सुरक्षाबलों द्वारा किए गये बलात्कार एवम हत्या के विरोध में मणिपुर में जो व्यापक जनांदोलन हुआ था उसी के तहत मणिपुर के सामाजिक आंदोलन में अग्रणी रही इन महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर असम राइफ़ल्स के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन किया था.
यह प्रदर्शन जो अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां हासिल कर सका, जबरदस्त क्षोभ और गुस्से से भरा था जो सेना के खिलाफ़ था. उन प्रदर्शनकारी महिलाओं ने सेना को ललकारा था कि आओ, अगर हिम्मत है तो सरेआम हम सब का बलात्कार करो. मणिपुर की महिलाओं के उस प्रदर्शन और मुंबई में देवदासियों के प्रदर्शन में आकाश-पाताल का फ़र्क था. वह प्रतिरोध था और यह कुछ सुविधाओं की मांग थी. यह प्रदर्शन महाराष्ट्र निराधार और देवदासी महिला संगठन के बैनर तले था.
इन्होंने राज्य सरकार से मदद नहीं मिलने पर केंद्र सरकार से संजय गांधी निराधार योजना के तहत मदद मांगी थी. इस सहायता की पात्रता की कुछ शर्ते पूरी नहीं कर रही थीं इसलिए उन शतरें को खत्म करने की मांग थी. सरकार से अपने हक की मांग करने से कतई असहमति नहीं है लेकिन प्रदर्शन के तरीकों पर जरूर विचार किया जाना चाहिए. यह पुरुष प्रधान मानसिकतावाला समाज औरत की गिनती उसके देह को केंद्र में रख कर ही करता है.
यानी उसका शरीर ही उसका सब कुछ है और उसके माध्यम से उस सब कुछ को ही सबसे बड़े या अंतिम हथियार के रूप में पेश करने जैसी बात है. पश्चिम के देशों में, जहां उपभोक्तावाद हमारे से दो कदम आगे है और हमारा समाज भी लगातार कदमताल करते जा रहा है, वहां ऐसे प्रदर्शन आम बताये जाते हैं.
(लेखिका स्त्री अधिकार संगठन व दिल्ली विश्वविद्यालय से संबध हैं)
यह सिफ अनाज का सडऩा नहीं है
कृष्णप्रताप सिंह
1.लूट की आंधी-तूफ़ान की तरह आ रही खबरों ने सरकारी अनाज के गोदामों के बाहर सडऩे की खबरों से लोगों का ध्यान हटा दिया.
2.गैरजिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की बात करनेवाले कृषि मंत्री अब कह रहे हैं कि ज्यादा अनाज सड़ा ही नहीं.
3.जिस मात्रा को वे तुच्छ बता रहे हैं वह कुल भंडारित अनाज का कम से कम 15 प्रतिशत तो है ही.
न्याय का सामान्य-सा नियम है कि एक अपराध को दूसरे का औचित्य सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. लेकिन देश की सरकारी व्यवस्था की मैली गंगा ठीक इसकी उल्टी दिशा में बहने लगी है और उसकी धारा में भ्रष्टाचार व काहिली की हर दूसरी जुगलबंदी पहली को वैधता प्रदान करती और उसकी ओर से लोगों का ध्यान हटा देती है.
इसका सबसे अच्छा और ताजा उदाहरण नयी दिल्ली में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में हुई व्यापक लूट है. इस लूट की आंधी तूफ़ान की तरह आ रही खबरों ने सरकारी अनाज के गोदामों के बाहर खुले में सडऩे की उन खबरों की ओर से लोगों का ध्यान बरबस हटा दिया जो इस बार मानसून आने के साथ ही आनी शुरू हो गयी थीं. अब लूट का त्रास देश को इतना उद्विग्न किये हुए है कि किसी के भी नथुने अनाज सडऩे की दुर्गंध महसूस नहीं कर पा रहे.
इससे कृषि मंत्री शरद पवार को यह कहकर पल्ला झाड़ लेने की सहूलियत हासिल हो गयी है कि जो अनाज सड़ रहा है, वह तो सरकार द्वारा भंडारित कुल अनाज का एक छोटा अंश है. उसे लेकर बहुत चिंतिंत होने की जरूरत नहीं.मौके का फ़ायदा उठा कर उन्होंने यह भी कह दिया कि अनाज सड़े तो सड़े, वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक उसे मुफ्त में गरीबों में नही बांटनेवाले. वैसे भी कृषि मंत्री एक पहुंचे हुए राजनीतिज्ञ हैं और जानते हैं कि कब जनता के रोष को किस तरह दूसरी दिशा में मोड़ा व उसकी तीव्रता को कम किया जा सकता है.
याद कीजिए, आइपीएल के घोटालों और खाद्यान्नों की मंहगाई के लिए चौतरफ़ा आलोचना के शिकार होने के बाद कैसे उन्होंने प्रधानमंत्री से निवेदन कर डाला था कि उनकी जिम्मेदारियां थोड़ी घटा दी जायें लेकिन अब वे इसकी जरूरत महसूस नहीं कर रहे क्योंकि आलोचनाओं का रुख राष्ट्रमंडल खेलों की ओर मुड़ गया है. शुरू में अनाज सडऩे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की बात करने वाले कृषि मंत्री अब कह रहे हैं कि ज्यादा अनाज सड़ा ही नहीं तो इससे कम से कम दो बातें साफ़ हैं- न जवाबदेह अधिकारियों पर कार्रवाई होगी और न ही भंडारण क्षमता बढ़ाने की कोशिशें की जायेंगी.
जब कोई समस्या ही नहीं है तो इनकी जरूरत ही क्या? फिऱ इस आरोप की सफ़ाई देने की भी क्या जरूरत कि अनाज जानबूझ कर सड़ाया जा रहा है ताकि बाद में शराब निर्माताओं को बेचा जा सके. कृषि मंत्री की पार्टी की साङोवाली महाराष्ट्र सरकार ने शराब लाबी के प्रभाव में आकर व्यापक विरोध की अनदेखी कर राज्य के निर्माताओं को सड़ा अनाज खरीद कर शराब के उत्पादन में इस्तेमाल करने की इजाजत से भले ही इस आरोप को आधार प्रदान कर दिया हो, स्थिति को झुठलाने के प्रयासों के बीच धीरे-धीरे वर्षा खत्म हो जायेगी और रेल पटरियों तक पर अनाज सडऩे की बात अपने आप आयी गयी हो जायेगी! सोचिए कि ऐसा उस देश में होगा जहां चालीस करोड़ से ज्यादा लोगों को अभी भी दिन भर में सिफऱ् एक वक्त का भोजन नसीब होता है.
वह भी किसी तरह पेट भरने लायक, पोषक नहीं.आइए, कृषि मंत्री के कहे की थोड़ी पड़ताल करें. सड़े अनाज की जिस मात्रा को वे तुच्छ बता रहे हैं वह कुल भंडारित सरकारी अनाज का कम से कम 15 प्रतिशत तो है ही. और यह प्रतिशत पंजाब व हरियाणा में भी नीचे नहीं जाता, जहां देश का लगभग आधा गेहूं उत्पादन होता है. पता नहीं इसके कितना और बढऩे पर कृषि मंत्री को लगेगा कि सडऩ अब तुच्छ नहीं रही! उत्तर प्रदेश का हाल तो और भी बुरा है.
वहां राहुल गांधी की अमेठी तक में लोग सड़ा गला अनाज बीनते बटारते टेलीविजन चैनलों पर देखे जा सकते हैं. मगर इस प्रदेश में अनाज गोदामों की कमी से नहीं बल्कि इसलिए सड़ रहा है कि राज्य भंडार निगम ने अपने ग्यारह में से छ गोदाम एक बड़ी कंपनी को किराये पर दे रखे हैं जिसने उनमें शीतल पेयों की बोतलें, सिगरेटों के पैकेट और शराब का भंडारण कर रखा है.
यहां कृषि मंत्री इस बात की छूट ले सकते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार पर उनका कोई वश नहीं चलता. लेकिन जो भारतीय खाद्य निगम खुद कृषि मंत्री के अधीन है, वह भी स्वीकार करता है कि पिछले दस सालों से खाद्यान्न भंडारण बढ़ाने की कोई सुसंगत योजना उसके पास नहीं है. वैसे इस निगम का चाल चलन भी उत्तर प्रदेश के भंडारागार निगम से कुछ अलग नहीं है.
भंडारण क्षमता से कम अनाज भंडारित होने पर भी इसके गोदामों में अनाज खराब होता रहता है. इसलिए कि अनाज को सड़ा दिखा कर उसके औने-पौने निस्तारण से भी जेबें गरम करने का खेल होता है. कृषि मंत्री इसके जिम्मेदार अफ़सरों पर कार्रवाई की बात कर रहे थे तो भी यह सवाल अनुत्तरित था कि ऐसी कार्रवाई से खराब हुआ अनाज क्या फिऱ से लोगों की भूख मिटाने लायक बन पायेगा? अगर नहीं तो इसका हासिल क्या है? फिऱ क्यों नही ऐसी दूरदर्शी नीतियां बनायी जातीं कि आग लगने पर कुआं खोदने की प्रवृत्ति का उन्मूलन किया जा सके.
यानी मानसून आने से पहले ही संबंधित अधिकारियों को गोदामों में रखे अनाज की हिफ़ाजत की याद दिलायी जा सके. भारतीय खाद्य निगम की मानें तो उसने तो इसकी याद दिलाई भी थी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान तो कहते हैं कि उनके राज्य में अनाज सडऩे की नौबत इसलिए आयी कि केंद्र ने अपने हिस्से का अनाज उठाया ही नहीं!दुर्भाग्य से दूरदर्शी नीतियां बनाना एवं उसके अनुसार व्यवस्था चलाना जिन लोगों के हाथ में है, वे जनप्रतिनिधि होकर भी अधिकारियों से कहीं ज्यादा लापरवाह और गैरजिम्मेदार हो गये हैं.
कई मामलों में उन्होने अधिकारियों के साथ मिलकर जनविरोघी गठजोड़ बना लिया है. यह अकारण नहीं हो सकता कि सर्वोच्च न्यायालय को सरकार को सुझाना पड़ता है कि वह सडऩे को छोड़ दिये गये अनाज को उन गरीबों के बीच बंटवा दे जो भूखे हैं. फिऱ भी कृषि मंत्री ऐसा करने से मना कर देते हैं.
केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी पर भी गौर नहीं करती जिसमें उसने कहा था कि गरीबों को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध कराने की प्रणाली में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय किये जाने की जरूरत है क्योंकि यह प्रणाली कालाबाजारियों एवं बिचौलियों के कब्जे में चली गयी हैं. यह लोग उस अनाज को भी नहीं छोड़ रहे जिस पर सबसे पहला हक गरीबों का बनता है.खुले बाजार में अनाजों की मंहगाई आज भी चिंता का सबब बनी हुई है.
अगर सरकार महज उतना अनाज ही, जिसे बचाने के प्रबंध उसके पास नहीं थे, मानसून से पहले खुले बाजार या जन वितरण प्रणाली के लिए जारी कर देती तो कम से कम अनाजों की कीमतों को बढऩे से रोका जा सकता था. इससे न सिफऱ् गरीबों को राहत मिलती बल्कि जग हंसाई भी सरकार के हिस्से नहीं आती. लेकिन ऐसा तब होता जब इसका जीडीपी पर कोई असर पडऩा होता.
फि़लहाल देश में विकास की जो नई अवधारणा सामने लायी जा रही है, उसमें सब कुछ जीडीपी की उछाल और अर्थ व्यवस्था के बूम पर ही निर्भर करता है. गरीब मरते हैं तो मरें. एक बार राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अपने संदेश में कहा था कि आज देश में कोई भूखा सोता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में अनाज की कमी है. वास्तव में वह भूखा इसलिए है कि अनाज खरीद सकने की क्रय-शक्ति उसके पास नहीं है.
आज भी कौन कह सकने की स्थिति में है कि सारे भूखों को क्रय-शक्ति संपन्न कर दिया गया है? गैरजवाबदेही के दौर में इसका जवाब कब मिलेगा, यह भी किसी को नहीं मालूम. सरकार में इतनी हया बची ही नहीं है कि वह इसकी शर्म महसूस कर सके. वह भूख से मौतों पर शर्म महसूस नहीं करती तो अनाज सडऩे से क्यों महसूस करने लगी?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
भगवा कहने से क्यों भड़के?
सत्येंद्र रंजन
1.कुछ नेताओं का कहना है कि चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद की बात कह कर भारतीय संस्कृति का अपमान किया है.
2.मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मसजिद, अजमेर शरीफ़, गोवा की घटनाएं क्या उन्होंने जो कहा, उसे कहने के ठोस सबूत नहीं हैं?
3.क्या वजह थी कि आडवाणी और राजनाथ सिंह आतंकवाद का आरोप लगने के बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह के बचाव में आगे आये.
गृह मंत्री पी चिदंबरम भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के दूसरे संगठनों के निशाने पर हैं. अभी कुछ समय पहले तक यही संगठन चिदंबरम से बेहद खुश थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उनकी तारीफ़ में सार्वजनिक बयान दिया था. राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने उनके प्रति पुरजोर समर्थन जताते हुए कांग्रेस पार्टी और सरकार में मौजूद मतभेदों के आधार पर उनको कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी. लेकिन तब मामला माओवाद का था.
अब मुद्दा भगवा आतंकवाद का है. पिछले हफ्ते राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और सुरक्षा बलों के अधिकारियों के सम्मेलन में चिदंबरम ने देश की सुरक्षा के लिए मौजूद चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्हें भगवा आतंकवाद के खतरे से भी आगाह किया. यह भाजपा और संघ परिवार को नागवार गुजरा है.
उनकी तरफ़ से चिदंबरम से माफ़ी मांगने की मांग तो की जा रही है, कुछ नेताओं ने चिदंबरम से इस्तीफ़े की मांग भी कर दी है. भाजपा नेताओं का कहना है कि चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद की बात कह कर भारतीय संस्कृति का अपमान किया है, क्योंकि साधु-संत भगवा कपड़े पहनते हैं. कुछ बयानों में इस तरफ़ भी ध्यान दिलाया गया है कि भारत के राष्ट्रीय झंडे में सबसे ऊपर केसरिया रंग है और इस तरह यह देश का अपमान है. संघ परिवार की तरफ़ से उठे शोर, हिंदू वोट गंवाने की चिंता और संसदीय समीकरणों में भाजपा से बने नये तालमेल ने कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में डाल दिया है.
पार्टी ने सार्वजनिक बयान जारी कर खुद को चिदंबरम के बयान से अलग किया. वही घिसी-पिटी बात दोहरायी कि किसी मजहब का आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं होता है. यह बात अपने-आप में ठीक है. लेकिन जब यह बात किसी हकीकत पर परदा डालने के लिए कही जाती है, तो यह खतरनाक हो जाती है. कोई धर्म आतंकवाद की शिक्षा नहीं देता. लेकिन धर्म के नाम पर आतंकवाद फ़ैलाया जाता है, यह भी उतना ही सच है.
यहां मुद्दा यह नहीं है कि चिदंबरम ने जिस शब्द का इस्तेमाल किया, वह सही है या नहीं? मुद्दा यह है कि जिस मसले का उन्होंने जिक्र किया, वह आज एक हकीकत है या नहीं? मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मसजिद, अजमेर शरीफ़ दरगाह और गोवा की घटनाएं क्या उन्होंने जो कहा, उसे कहने के ठोस सबूत नहीं हैं? समझौता एक्सप्रेस पर हमले की जांच अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) कर रही है.
वह जिन नजरियों से इस घटना की तहकीकात कर रही है, उसमें हिंदुत्ववादी आतंकवाद के हाथ का पहलू भी शामिल है. क्या इन घटनाओं और उनसे पैदा हो रहे खतरे का जिक्र सुरक्षा अधिकारियों के सम्मेलन में नहीं होना चाहिए? उसे भगवा आतंकवाद कहा जाये या या हिंदुत्ववादी आतंकवाद, इससे ओखर क्या फ़र्क पड़ जाता है? इसलामी या इसलामिक या जिहादी आतंकवाद आज मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में प्रचलित शब्द हैं.
ये शब्द इसलिए प्रचलित हुए, क्योंकि जो लोग ऐसे आतंकवाद को अंजाम देते हैं, वे इसलाम की तरफ़ से जंग लडऩे का दावा करते हैं, भले इसलाम की उनकी परिभाषा बेहद संकीर्ण हो. जिन संगठनों ने मालेगांव, मक्का मसजिद, अजमेर शरीफ़ या गोवा में बम धमाके किये उनका भी एक खास मकसद है और वे एक खास मजहबी पहचान का चोला ओढ़ कर इस काम में निकले हैं. यहां गौरतलब यह है कि इस पहचान और मकसद दोनों का संघ परिवार से मेल है.
वरना क्या वजह थी कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह आतंकवाद का आरोप लगने के बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बचाव में आगे आये? प्रज्ञा के साथ राजनाथ सिंह की तस्वीर मीडिया में छपी थी. क्या इस पर उन्होंने कभी अफ़सोस जताया? और सबसे बड़ी बात यह कि आज तक भाजपा ने अभिनव भारत जैसे संगठन, और प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित जैसे आतंकवाद के आरोपियों की खुले एवं बेलाग शब्दों में निंदा क्यों नहीं की है? यह बातें यह समझने के लिए काफ़ी हैं कि आतंकवाद का भी एक रंग और एक चेहरा होता है.
यह कहना कि आतंकवाद तो आतंकवाद है, उसका कोई धर्म या समुदाय नहीं होता, सच्चाई से मुंह मोडऩा है. कांग्रेस जैसी समझौता परस्त पार्टी यह कर सकती है, लेकिन देश का जागरूक जनमत ऐसा नहीं कर सकता. ना ही पेशेवर सिद्धांतों पर चलने वाली सुरक्षा एजेंसियां ऐसा कर सकती हैं. जिहादी और हिंदुत्ववादी आतंकवाद का एक ही मकसद नहीं है.
अगर दोनों के दो मकसद हैं, तो उनसे लडऩे के लिए उन्हें अलग-अलग ढंग से ही समझना होगा.हिंदुत्ववादी चरमपंथी संगठन और उनसे उपजा आतंकवाद आज देश में धार्मिक गोलबंदी की कोशिश में है. वैसी ही कोशिश में, जैसी एक समय अयोध्या आंदोलन के नाम पर की गईथी. ये संगठन जानते हैं कि जब तक व्यापक रूप से ऐसी राजनीतिक गोलबंदी नहीं होती, तब तक हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो सकती और सावरकर-गोलवरकर के सपनों का भारत नहीं बनाया जा सकता.
जिहादी आतंकवाद अगर धमाकों और विवेकहीन हत्याओं के जरिये भारत के आत्मविश्वास को तोड़ कर यहां अफऱातफऱी फ़ैलाना चाहता है तो हिंदुत्ववादी आतंकवाद सियासी गोलबंदी के जरिये देश की सत्ता पर काबिज होकर आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की जगह एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहता है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों को मातहत और पुरातन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को फिऱ से स्थापित किया जा सके. दोनों आतंकवाद के अपने खतरे हैं.
पाकिस्तान ने जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देकर जो बीज बोया, उसकी फ़सल वो आज काट रहा है. उससे आज सबक लेने की जरूरत है. हिंदुत्ववादी आतंकवाद की धारा अगर मजबूत हुई तो वैसा ही परिणाम भारत को भुगतना पड़ सकता है. लेकिन संघ परिवार कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. अगर देश के गृहमंत्री ने इस खतरे की तरफ़ इशारा किया है, तो जरूरत उसकी गंभीरता में जाने की है.
इस बात को समझने की जरूरत है कि यह खतरा आज अपने पंख इतना फ़ैला चुका है कि उसके प्रति सुरक्षा एजेंसियों को आगाह करने की जरूरत पड़ रही है. लेकिन भाजपा और संघ परिवार ने इसे भी सियासी गोलबंदी का मुद्दा बना दिया है. जब देश किसी चरमपंथ या आतंकवाद को इस हद तक नैतिक और राजनीतिक समर्थन मिले तो समझा जा सकता है कि खतरा कितना गंभीर है. चिदंबरम ने इससे आगाह कर देश की बड़ी सेवा की है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
गरीबों पर चूहा-मेढ़क की तरह परीक्षण
सुभाष गाताडे
निश्चित ही ऐसे काम में मुब्तिला लोगों पर हत्या या हत्या के प्रयास जैसी धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
स्वास्थ्य मंत्री ने माना है कि देश में ड्रग ट्रायल के दौरान विगत तीन सालों में 1599 लोगों की मृत्यु हुई.
3. मरीजों से हासिल की गयी 'सहमति' भी विवादास्पद दिखाई पड़ती है.
अस्पताल में अपनी बीमारियों के इलाज के लिए पहुंचनेवाले गरीबों के शरीर पर देशी-बहुदेशीय कंपनियों द्वारा विकसित की जा रही दवाइयों का उनकी जानकारी और सहमति के बिना किया गया प्रयोग, जो उनके लिए प्राणघातक भी साबित हो सकता है, किस श्रेणी का अपराध कहा जा सकता है? निश्चित ही ऐसे काम में मुब्तिला लोगों पर हत्या या हत्या के प्रयास जैसी धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
यह अलग बात है कि ऐसे कामों में प्रबुद्ध जनों की संलिप्तता के सामने आ रहे प्रमाणों के बावजूद ऐसे मसलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती और आम तौर पर मामले को दफऩा दिया जाता है. मालूम हो कि पिछले दिनों लोकसभा में प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वास्थ्य मंत्री दिनेशचंद्र द्विवेदी ने इस विस्फ़ोटक तथ्य को उजागर किया कि यहां ड्रग ट्रायल के दौरान विगत तीन सालों में 1599 लोगों की मृत्यु हुई है. कहने का तात्पर्य है कि हर माह लगभग 42 लोग इसका शिकार हो रहे हैं.
बेरूखी का यह आलम है कि अहम खबर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ही नहीं प्रिंट मीडिया में भी लगभग दबा दी गयी. दवा परीक्षण के मामले में किस हद तक दवा बनानेवाली बड़ी कंपनियों से लेकर स्वास्थ्य मंत्रालयों के नौकरशाहों, अस्पतालों, डॉक्टरों एवं समाजसेवा के नाम पर कायम तमाम एनजीओ के बीच अपवित्र गंठबंधन बना हुआ है, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है.
लाजिम है इस मामले में जबरदस्त अपारदर्शिता भी बरती जाती है, जिसे ऊपर से ही शह मिलती है.पिछले कुछ समय से अखबारों की सूर्खियों में रहे एचपीवी वैक्िसन प्रोजेक्ट को ही लें, जिसके संबंध में गुजरात और आंध्र प्रदेश में तीस हजार ओदवासी किशोरियों पर, जिनकी उम्र 10 से 14 साल के बीच थी -चल रहे क्िलनिकल ट्रायल को अप्रैल माह में रोकना पड़ा था.
इस परीक्षण के अंतर्गत'गार्डसिलÓ (मर्क) और सर्वारिक्स (जीएसके) जैसी दवाओं का प्रयोग किया जा रहा था. रोकने की वजह यह थी क्योंकि यह पता चला था कि परीक्षण के लिए जिम्मेदार इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च तथा'पाथÓ(प्रोग्राम फ़ॉर एप्रोपिएट टेक्नोलॉजी एंड हेल्थ) द्वारा दवा परीक्षणों के संबंध में कायम नैतिक मानदंडों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किया जा रहा था.
सर्वाइकल कैंसर रोकने के नाम पर जारी प्रस्तुत परीक्षण में प्रायोगिक दवा के दुष्परिणाम के चलते कुछ मौतों के भी समाचार आये थे. अब इस सिलसिले में ताजा समाचार यह है कि जब यह स्वयंसेवी समूह ने सूचना का अधिकार के तहत याचिका भेज कर यह जानना चाहा कि सर्वाइकल कैंसर रोकने के नाम पर इन कंपनियों के किस आधार पर परीक्षण की अनुमति दी गयी तथा उसका प्रोटोकोल क्या था.
तब उसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया के कार्यालय से यही जवाब मिला कि 'यह एक ट्रेड सिक्रेट है और तीसरी पार्टी के व्यवसायिक विश्वास का प्रश्न है, लिहाजा इसके बारे में जानकारी नहीं दी जा सकती.Ó (आरटीआइ एक्ट नॉट ऐप्लकेबल टू एचपीवी वैक्िसन प्रोजेक्ट, द हिंदू, 9 अगस्त 2010). गौरतलब है कि यह आउटसोर्सिग- यानी काम को अंजाम देने के लिए बाहर के स्रोत ढूढऩा- का जमाना है.
जाहिर बड़ी-बड़ी बहुदेशीय दवा कंपनियों द्वारा अपनी नयी दवाओं के परीक्षण का बोझ तीसरी दुनिया के मुल्कों की जनता पर छोडऩे के मामले में कुछ भी अनोखा नहीं है. मुंबई में पिछले साल आयोजित पहले इंडिया फ़ार्मा सम्मिट में इससे जुड़ी तमाम बातें सामने आयीं थीं. यह बात स्पष्ट हुई थी कि स्वास्थ प्रणाली की खामियों के चलते ऐसे प्रयोगों में वालंटियर बने लोगों की सुरक्षा का मसला अक्सर उपेक्षित ही रह जाता है, यहां तक कि मरीजों से हासिल की गयी'सहमतिÓभी विवादास्पद दिखाई पड़ती है.
यह अकारण नहीं कि ऐसे लोगों की सहज उपलब्धता के चलते, जो गैरजानकारी में नयी दवाओं का अपने शरीर पर प्रयोग करने के लिए तैयार रहते हैं, इन देशों की लचर स्वास्थ प्रणाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आउटसोर्स किये गये चिकित्सीय परीक्षणों का बाजार- आज 12,000 हजार करोड़ रुपये से आगे निकल चुका है. वैसे गरीब मरीजों पर दवा परीक्षणों का काम कितना खुल कर चलता है, यह किस्सा मध्यप्रदेश के इंदौर के एक चर्चित अस्पताल में भी पिछले दिनों सामने आया.
मरीजों द्वारा एवं शहर के जागरूक वर्गो द्वारा जब इस संबंध में आवाज बुलंद की गयी तब ड्रग ट्रायल के आरोपों से घिरे डॉक्टरों की तरफ़ से शहर के एक अग्रणी होटल में एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया. इसका मकसद कथित तौर पर लोगों को यह बताना था कि ओखर ड्रग ट्रायल क्या होता है ओद. जब श्रोताओं ने इसमें शामिल रहे डॉक्टरों से यह पूछा कि आखिर'गरीब मरीजों पर ही क्यों ट्रायल किये?Óतब स्पष्ट था कि इन डॉक्टरों ने मौन साध लिया.मालूम हो कि आम हिंदुस्तानी का बड़ी-बड़ी कंपनियों की दवाइयों के लिए गिनीपिग (परीक्षण चूहे) बनने का सिलसिला कोई नया नहीं है.
सन 1997 में देश के प्रमुख कैंसर संस्थान'इंस्टीट्यूट फ़ॉर साइटॉलॉजी एंड प्रिवेन्टिव एनकोलोजीÓ के तहत चला एक अध्ययन काफ़ी विवाद का विषय बना था. पता चला था कि 1100 ऐसी स्त्रियां, जो सर्वाइकल डिसप्लेसिया (गर्भाशय के मुख पर कोशिकाओं के विकास) से पीडि़त थी, का इलाज केवल इसलिए नहीं किया गया ताकि बीमारी किस तरह बढ़ती है उसका अध्ययन किया जाये.
इसके बाद भी जब अस्वाभाविक बढ़त देखी गयी और सर्वाइकल कैंसर की संभावना महसूस की गयी तब भी न तो उन स्त्रियों को इसके बारे में चेतावनी दी गयी और न ही उनका इलाज किया गया, बल्कि परीक्षण चूहों की तरह उन पर परीक्षण जारी रहा. ज्यादा विचलित करनेवाली बात यह थी कि यह समूचा अध्ययन देश के एक अग्रणी चिकित्सकीय खोज संस्थान के बैनर तले संचालित हो रहा था जिस पर चिकित्सीय शोध की नैतिक मार्गदर्शिका बनाने की प्रमुख जिम्मेदारी थी.
मुंबई में आयोजित सम्मेलन में उद्योगपतियों के संगठन फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन चेंबर ऑफ़ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज (फि़क्की) की तरफ़ से एक रिपोर्ट भी पेश की गयी, जिसमें यह जोर भी दिया गया कि 'राष्ट्र्रीयÓ हितों को सुरक्षित करने के लिए उपयोगी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है.
मालूम हो कि पिछले दिनों ड्यूक युनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के मेडिकल रिसर्च इस बात को लेकर आश्चर्यचकित थे कि वर्ष 2007 में जिन नये ड्रग्स पर परीक्षण चले थे, उसके संबंध में एक तिहाई से अधिक परीक्षण अमेरिका के बाहर हुए थे. प्रस्तुत अध्ययन में अमेरिका की बीस बड़ी फ़ार्मास्युटिकल्स कंपनियों ने 500 से अधिक चिकित्सीय परीक्षणों का विश्लेषण किया गया था.
अधिक महत्वपूर्ण बात यह था कि जिन बाहर के मुल्कों में इन परीक्षणों को अंजाम दिया गया, उसके बारे में कंपनियों के लिए पहले से स्पष्ट था कि उनके इन दवाओं के लिए कोई खास मार्केट मिलनेवाला नहीं है. जब तक चिकित्सीय नैतिकता के केंद्र में 'जानकारी के साथ सहमतिÓ का मसला नहीं रहेगा, तब तक ऐसे प्रयोगों का बार-बार दोहराव हम देखते रहेंगे.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
महाशक्ति की विडंबना
नीरज सिंह
भले ही हम अमेरिका के इराक और अफग़ानिस्तान पहुंच जाने की निंदा करें. अमेरिका की साम्रज्यवादी नीतियों के खिलाफ़ धीमी जुबान में आवाज उठायें. लेकिन यह भी सच है कि हम हर संकट के लिए अमेरिका की ओर ही देखते हैं. पाकिस्तान भारत को घुड़की देता है या फिऱ अफग़ानिस्तान में हमारी विदेश नीति कमजोर पड़ती है.
तब भी हम चाहते हैं कि महाशक्ति हमारे साथ आये. शायद यही महाशक्ति की विडंबना है. सैमुअल हटिंगटन के शब्दों में अमेरिका विश्व बनता है. विश्व अमेरिका बनता है. लेकिन अमेरिका अमेरिका ही रह जाता है.एक दौर था, जब अमेरिका पृथकतावाद की नीतियों पर चलते हुए दुनिया में घटने वाली घटनाओं से खुद को अलग रखता था.
द्वितीय विश्व युद्ध में उसे कूदना पड़ा और तब से अमेरिका की स्थिति ऐसी हो गई है कि दुनिया के हर क्षेत्रों में उसे अपनी नीतियां क्रियान्वित करनी पड़ती हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका विश्व में महाशक्ति की ऐसी वर्चस्व वाली भूमिका में आ गया है जिससे निकल पाना उसके लिए संभव नहीं है. हालांकि, ऐसा कहने के पीछे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के हर कदम को जायज ठहराना नहीं है.
पर इस सच्चाई से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि दुनिया के अनेक देश उसकी आलोचना भी करते हैं और संकट के समय उससे हस्तक्षेप की अपेक्षा भी रखते हैं.जाहिर है इस स्थिति के अनेक जोखिम भी हैं. एक ओर उसकी नीतियों से कोई पक्ष संतुष्ट होता है तो दूसरी ओर दुखी और खिन्न पक्षों द्वारा प्रतिशोधी कार्यावाही की आशंका भी बढ़ जाती है. जब अमेरिकी रक्षा और विदेश नीति इस्रइल की ओर झुकती है तो उसके इस कदम से फ़लिस्तीन और पश्चिमी एशिया के अन्य देशों को चोट पहुंचती है.
जब वह कुवैत के साथ खाड़ी युद्ध में उतरता है तो सद्दाम हुसैन उसका शत्रु बन जाता है. जब वह सोवियत शासन को उखाड़ फेंकने के लिए अफग़ानी लड़ाकुओं की सहायता करता है तो सभी उसके मित्र रहते हैं पर सोवियत सेनाओं के लौटने के बाद ज्योंही वह अफग़ानिस्तान से हाथ खींचता है वहां गृहयुद्ध शुरू हो जाता है.
उसका कोई मित्र नहीं बचता. सउदी अरब में उसके सैन्य ठिकानों से ओसामा बिन लादेन जैसे वे लोग लोग नाराज हो जाते हैं जो कल तक उसके सहयोग से सोवियत सेनाओं को खदेडऩे का अभियान चलाते रहे. इसी तरह जब कोसोवोइयों को उसका समर्थन मिलता है तो सर्ब नाराज हो जाते हैं. अमेरिका के संदर्भ में ऐसे उदाहरण दुनिया में सर्वत्र मिलेंगे. वास्तव में इसे इतिहास की विडंबना ही कहेंगे कि जैसे-जैसे आपकी शक्ति में वृद्धि होती जाती है खतरे उसी अनुपात में बढ़ते जाते हैं.वास्तव में अमेरिकी विरोधाभास के दो पक्ष हैं.
वियतनाम युद्ध अमेरिका पर एक बदनुमा दाग की तरह है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि वह अमेरिका ही था जहां हजारों लोग वियतनाम में अमेरिकी अत्याचार के खिलाफ़ सड़कों पर उतर आए थे. रोनाल्ड रीगन के समय में जब आजाद हुए निकारागुआ को मिलने वाली राशि भेजे जाने से रोक दिया गया था क्योंकि सैंन्दिनिस्ताइयों से कुछ मतभेद हो गये थे.
तब अमेरिका में ऐसा लगा था कि मानों भुखमरी निकारागुआ में नहीं अमेरिका में ही आ गई हो. पूरे देश में कई नागरिक संगठनों ने निकारागुआ भेजने के लिए चंदा इकठ्ठा किया. ऐसे अनेक उदाहरण सामने लाये जा सकते हैं.
कई आवाजों के बीच
total stateरविभूषण
1.नयी उदार अर्थ-व्यवस्था का दबाव और दबदबा सभी क्षेत्रों में है. इसके पहले भीषण आवाजें भी सुनी जाती थीं.
2.भारतीय लोकतंत्र कामकाजी नहीं कागजी बन कर रह गया है. इसके दो चेहरे हैं.
3.क्या अब सबकुछ निजी पूंजी के हवाले कर दिया जाना चाहिए?
भारत विभिन्न जातियों, समुदायों, धर्मो, विश्वासों, सिद्धांतों, धारणाओं, दृष्टियों, विचारों, व्यवहारों, संस्कृतियों का देश है, जिनमें सदैव संवाद होता रहा है. यह देश अपने इन गुणों के कारण सदैव लोकतांत्रिक देश रहा है. भारतीय लोकतंत्र को जीवित और गतिमान बनाए रखने में यहां के वासियों की सबसे बड़ी भूमिका है.
कथन आधुनिक युग में माओ-त्से-तुंग का है कि सौ फूलों को खिलने दो, पर भारत में अनेक फूल एक साथ खिलते रहे हैं. राज्य का ध्यान इस ओर कम रहा और सत्ता राजनीति से विमुखता वह कारण बनी, जिसने स्वतंत्र भारत में अनेक नए दहकते सवाल खड़े कर दिए हैं. कई आवाजें अनकही-अनसुनी रह गई हैं और सर्वत्र एक दहाड़ती आवाज प्रमुख होती गयी है, जो सत्ताधारियों, उनके समर्थकों और अनुयायियों की है. यह लोकतंत्र के लिए घातक है.
कई आवाजों के बीच का आवश्यक निरंतर संवाद अब समाप्त प्राय है और सर्वत्र प्रभुत्वशाली आवाज सुनाई पड़ती है. मीडिया में भी सभी आवाजें सुनाई नहीं देती. यह एक साथ लोकतंत्र, भाषा, संस्कृति, सामाजिक भावना, सामुदायिकता सबके लिए नुकसानदेह है.नयी उदार अर्थ-व्यवस्था का दबाव और दबदबा सभी क्षेत्रों में है. इसके पहले भीषण आवाजें भी सुनी जाती थी.
इस उदार अर्थ-व्यवस्था के सहयात्री दूसरी आवाजों को नजर अंदाज करते हैं. आर्थिक समद्धि भी इस कारण कुछ प्रतिशत लोगों के यहां है. आज भी भारत की साठ-सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है. वह कृषि पर अवलंबित है. राज्य को, सरकारों को अपने देश की विशाल जनसंख्या की चिंता नहीं है. उसका इस विशाल समुदाय से संबंध-विच्छेद हो चुका है.
फासले निरंतर बढ़ रहे हैं. जिससे एक अशांत वातावरण का निर्माण हो रहा है. यह अराजक और हिंदू वातावरण में न बदले इसकी ईमानदार चिंता कम है. कुछ उदाहरणों से इसे देखा-समझा जा सकता है. पहला उदाहरण माओवादी नेता-प्रवा चेनकुरी आजाद राजकुमार का है, जिसकी आंध्र प्रदेश पुलिस ने हत्या की और इसे मुठभेड़ बताया. इस फर्जी मुठभेड़ के तथ्य सामने आ चुके हैं.
गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने स्वामी अग्निवेश को शांति-खोज के लिए माओवादी से बातचीत करने को कहा था. अग्निवेश की भूमिका एक मध्यस्थ की थी. वे सार्थक संवाद करने की भूमिका में थे. माओवादी नेता आजाद दंडकारण्य के माओवादी नेताओं को उनका संदेश पहुंचाने वाले थे.
आंध्र प्रदेश की पुलिस ने आदिलाबाद जिले में एक जुलाई को आजाद की हत्या कर दी. (आउटलुक, छह सितंबर 2010) ने द मर्डर ऑफ आजाद का तथ्यांवेषण किया. आजाद के साथ पत्रकार हेमचंद पांडे भी मारे गए. आवाजों के बीच का संवाद समाप्त किया गया. नयी उदार अर्थव्यवस्था के दौर में राज्य का चरित्र और उसकी भूमिका भिन्न है.
सरकारें और विभिन्न राजनीतिक दल के सरोकार भी पहले की तरह नहीं हैं. सरोकारों के बदलने से व्यवहार और भाषा भी बदलती है. सरोकारों के कारण ही नीतियों का रूप-स्वरूप निर्मित होता है. पूर्व नीतियां धरी रह जाती हैं और पूर्व कानूनों पर भी अमल नहीं हो पाता. संसद में पारित पूर्व कानूनों की अनदेखी और उपेक्षा के क्या कारण हैं.
नये कानून किसके हित को ध्यान में रख कर बनते हैं. वेदांता परियोजना में एक साथ तीन कानूनों-पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण और वनाधिकार के पालन का, उल्लंघन क्यों हुआ? क्या इसमें नेताओं और अधिकारियों की कोई सहमति नहीं रही होगी? वेदांता के बॉक्साइट खनन परियोजना का विरोध करनेवाले आदिवासियों की चिंताएं सरकार, उद्योगपति और नौकरशाहों की चिंताओं से भिन्न है. ये दोनों भिन्न प्रकार की चिंताएं हैं. क्या इन दोनों के बीच सार्थक स्तर पर संवाद संभव है? केंद्र में सप्रग की सरकार है और ओडि़शा में बीजद की.
क्या कांग्रेस और बीजद ही नहीं, अन्य सभी भारतीय राजनीतिक दलों की विकास-संबंधी भिन्न दृष्टियां है? प्रश्न किसी दल विशेष का नहीं है क्योंकि तमाम क्रीम पाउडर के बाद भी सबके चेहरे एक हैं- आर्थिक-विकास नीतियों का है, जहां कोई मतभेद नहीं है. राजनीतिक दलों की आवाजों में क्या सचमुच कोई भिन्नता है? जन-दबाव के कारण कुछ समय के लिए वे भिन्न रूप में सोचने का स्वांग भले करें, पर उनकी आवाजें भिन्न नहीं हैं.
वेदांता रिसोर्सेज के अनिल अग्रवाल की संपत्ति एक वर्ष में कई बिलियन डालर बढ़ जाती है, नेताओं अफसरों की संपत्ति में धुंआधार इजाफा होता है, पर गरीबों की दशा नहीं सुधरती. आवाजें प्रमुख दलों के बीच भी एक नहीं है. क्या कांग्रेस के सभी नेताओं और मंत्रियों की आवाजें एक हैं? दल विशेष में आवाजों की भिन्नता से उसकी लोकतांत्रिकता का संबंध नहीं है. वहां विरोधी आवाज तो दूर, भिन्न आवाजें भी कम सुनाई पड़ती हैं.
इन भिन्न आवाजों से यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि उनमें वास्तविक रूप से जन-स्वर सुनाई पड़ रहे हैं. कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के स्वर समान नहीं हैं. दोनों एक ही दल के हैं. सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद भी शरद पवार इसके पक्ष में नहीं हैं कि अनाज गरीबों को मुफ्त मिले और जयराम रमेश की चिंता में निश्चित रूप से पर्यावरण है.
क्या सचमुच सभी मंत्रियों की चिंताएं उनके अपने कार्यक्षेत्र से जुड़ी हुई हैं? प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनेवाले और उनका अंधाधुंध दोहन करनेवाले क्या एक साथ हो सकते हैं? दृष्टियों, विचारों, धारणाओं, लगावों, सिद्धांतों, व्यवहारों, कार्यप्रणालियों, संप्रभुताओं आदि के आधार पर आवाजें बदलती हैं. मानस-निर्माण का कार्य सबसे बड़ा है और अब भारत का कोई भी शिक्षण-संस्थान और विश्वविद्यालय पूर्णत: जनोन्मुखी मानस का निर्माण नहीं करता.
संस्थाएं इसी कारण अविश्वसनीय हो गयी हैं. अविश्वसनीयता विगत दो दशकों में सर्वाधिक बढ़ी है, जिसका सीधा संबंध शब्द और कर्म की विपरीतता से है. शब्दों का प्रोफाइल आज सर्वाधिक है, पर कर्म (सामाजिक) की हलचल कम है. कागज पर लिखे, टंकित, मुद्रित शब्द प्रमुख है. सभी आदिवासियों के पास उनकी जमीन के कागज नहीं हैं.
वे वनों में रहते हैं और उनके पास कोई कागजी प्रमाण नहीं है. भारतीय लोकतंत्र कामकाजी नहीं कागजी बन कर रह गया है. इसके दो चेहरे हैं. भारतीय लोकतंत्र, भारतीय राजनीति के दो चहरे- जिनमें छद्म और वास्तविक की पहचान आसान नहीं है. अभी लगभग एक सप्ताह पहले रामचंद्र गुहा ने भुमंडलीकरण के दो चेहरे शीर्षक के अपने लेख में मंगलूर के साफ्टवेयर उद्योग और वेल्लारी के खान उद्योग में दिन-रात का अंतर देखा है.
एक कर्नाटक के दो चेहरे. एक ओर इंफोसिस है और दूसरी ओर गैर कानूनी ढंग से विगत एक दशक में कर्नाटक से तीन करोड़ टन लौह अयस्क के निर्यातक वेल्लारी में जंगल नष्ट हुए हैं, पानी के सोते सूखे हैं और नदियां प्रदूषित हुई हैं. वहां के खान उद्योगपति की मु_ी में राजनीति, प्रशासन सब कुछ है. रामचंद्र गुहा ने अपने लेख में पूंजीवाद के प्रगतिशील और पतनशील पों की चर्चा की है.
क्या राजकीय पूंजीवाद की निजी-निगमीय पूंजीवाद की सांठ-गांठ से कोई सार्थक परिणाम निकल सकता है? क्या अब सब कुछ निजी पूंजी के हवाले कर दिया जाना चाहिए? फिर छोटी पूंजी का क्या होगा? क्या बड़ी मछलियां सभी छोटी मछलियों को निगल लेंगी? क्या आवाजों की भिन्नता बची रहेगी? क्या भारतीय लोकतंत्र एक स्वस्थ और आदर्श लोकतंत्र रहेगा? क्या इस लोकतंत्र में लोक की आवाज सुनी जायेगी?
1.नयी उदार अर्थ-व्यवस्था का दबाव और दबदबा सभी क्षेत्रों में है. इसके पहले भीषण आवाजें भी सुनी जाती थीं.
2.भारतीय लोकतंत्र कामकाजी नहीं कागजी बन कर रह गया है. इसके दो चेहरे हैं.
3.क्या अब सबकुछ निजी पूंजी के हवाले कर दिया जाना चाहिए?
भारत विभिन्न जातियों, समुदायों, धर्मो, विश्वासों, सिद्धांतों, धारणाओं, दृष्टियों, विचारों, व्यवहारों, संस्कृतियों का देश है, जिनमें सदैव संवाद होता रहा है. यह देश अपने इन गुणों के कारण सदैव लोकतांत्रिक देश रहा है. भारतीय लोकतंत्र को जीवित और गतिमान बनाए रखने में यहां के वासियों की सबसे बड़ी भूमिका है.
कथन आधुनिक युग में माओ-त्से-तुंग का है कि सौ फूलों को खिलने दो, पर भारत में अनेक फूल एक साथ खिलते रहे हैं. राज्य का ध्यान इस ओर कम रहा और सत्ता राजनीति से विमुखता वह कारण बनी, जिसने स्वतंत्र भारत में अनेक नए दहकते सवाल खड़े कर दिए हैं. कई आवाजें अनकही-अनसुनी रह गई हैं और सर्वत्र एक दहाड़ती आवाज प्रमुख होती गयी है, जो सत्ताधारियों, उनके समर्थकों और अनुयायियों की है. यह लोकतंत्र के लिए घातक है.
कई आवाजों के बीच का आवश्यक निरंतर संवाद अब समाप्त प्राय है और सर्वत्र प्रभुत्वशाली आवाज सुनाई पड़ती है. मीडिया में भी सभी आवाजें सुनाई नहीं देती. यह एक साथ लोकतंत्र, भाषा, संस्कृति, सामाजिक भावना, सामुदायिकता सबके लिए नुकसानदेह है.नयी उदार अर्थ-व्यवस्था का दबाव और दबदबा सभी क्षेत्रों में है. इसके पहले भीषण आवाजें भी सुनी जाती थी.
इस उदार अर्थ-व्यवस्था के सहयात्री दूसरी आवाजों को नजर अंदाज करते हैं. आर्थिक समद्धि भी इस कारण कुछ प्रतिशत लोगों के यहां है. आज भी भारत की साठ-सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है. वह कृषि पर अवलंबित है. राज्य को, सरकारों को अपने देश की विशाल जनसंख्या की चिंता नहीं है. उसका इस विशाल समुदाय से संबंध-विच्छेद हो चुका है.
फासले निरंतर बढ़ रहे हैं. जिससे एक अशांत वातावरण का निर्माण हो रहा है. यह अराजक और हिंदू वातावरण में न बदले इसकी ईमानदार चिंता कम है. कुछ उदाहरणों से इसे देखा-समझा जा सकता है. पहला उदाहरण माओवादी नेता-प्रवा चेनकुरी आजाद राजकुमार का है, जिसकी आंध्र प्रदेश पुलिस ने हत्या की और इसे मुठभेड़ बताया. इस फर्जी मुठभेड़ के तथ्य सामने आ चुके हैं.
गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने स्वामी अग्निवेश को शांति-खोज के लिए माओवादी से बातचीत करने को कहा था. अग्निवेश की भूमिका एक मध्यस्थ की थी. वे सार्थक संवाद करने की भूमिका में थे. माओवादी नेता आजाद दंडकारण्य के माओवादी नेताओं को उनका संदेश पहुंचाने वाले थे.
आंध्र प्रदेश की पुलिस ने आदिलाबाद जिले में एक जुलाई को आजाद की हत्या कर दी. (आउटलुक, छह सितंबर 2010) ने द मर्डर ऑफ आजाद का तथ्यांवेषण किया. आजाद के साथ पत्रकार हेमचंद पांडे भी मारे गए. आवाजों के बीच का संवाद समाप्त किया गया. नयी उदार अर्थव्यवस्था के दौर में राज्य का चरित्र और उसकी भूमिका भिन्न है.
सरकारें और विभिन्न राजनीतिक दल के सरोकार भी पहले की तरह नहीं हैं. सरोकारों के बदलने से व्यवहार और भाषा भी बदलती है. सरोकारों के कारण ही नीतियों का रूप-स्वरूप निर्मित होता है. पूर्व नीतियां धरी रह जाती हैं और पूर्व कानूनों पर भी अमल नहीं हो पाता. संसद में पारित पूर्व कानूनों की अनदेखी और उपेक्षा के क्या कारण हैं.
नये कानून किसके हित को ध्यान में रख कर बनते हैं. वेदांता परियोजना में एक साथ तीन कानूनों-पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण और वनाधिकार के पालन का, उल्लंघन क्यों हुआ? क्या इसमें नेताओं और अधिकारियों की कोई सहमति नहीं रही होगी? वेदांता के बॉक्साइट खनन परियोजना का विरोध करनेवाले आदिवासियों की चिंताएं सरकार, उद्योगपति और नौकरशाहों की चिंताओं से भिन्न है. ये दोनों भिन्न प्रकार की चिंताएं हैं. क्या इन दोनों के बीच सार्थक स्तर पर संवाद संभव है? केंद्र में सप्रग की सरकार है और ओडि़शा में बीजद की.
क्या कांग्रेस और बीजद ही नहीं, अन्य सभी भारतीय राजनीतिक दलों की विकास-संबंधी भिन्न दृष्टियां है? प्रश्न किसी दल विशेष का नहीं है क्योंकि तमाम क्रीम पाउडर के बाद भी सबके चेहरे एक हैं- आर्थिक-विकास नीतियों का है, जहां कोई मतभेद नहीं है. राजनीतिक दलों की आवाजों में क्या सचमुच कोई भिन्नता है? जन-दबाव के कारण कुछ समय के लिए वे भिन्न रूप में सोचने का स्वांग भले करें, पर उनकी आवाजें भिन्न नहीं हैं.
वेदांता रिसोर्सेज के अनिल अग्रवाल की संपत्ति एक वर्ष में कई बिलियन डालर बढ़ जाती है, नेताओं अफसरों की संपत्ति में धुंआधार इजाफा होता है, पर गरीबों की दशा नहीं सुधरती. आवाजें प्रमुख दलों के बीच भी एक नहीं है. क्या कांग्रेस के सभी नेताओं और मंत्रियों की आवाजें एक हैं? दल विशेष में आवाजों की भिन्नता से उसकी लोकतांत्रिकता का संबंध नहीं है. वहां विरोधी आवाज तो दूर, भिन्न आवाजें भी कम सुनाई पड़ती हैं.
इन भिन्न आवाजों से यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि उनमें वास्तविक रूप से जन-स्वर सुनाई पड़ रहे हैं. कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के स्वर समान नहीं हैं. दोनों एक ही दल के हैं. सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद भी शरद पवार इसके पक्ष में नहीं हैं कि अनाज गरीबों को मुफ्त मिले और जयराम रमेश की चिंता में निश्चित रूप से पर्यावरण है.
क्या सचमुच सभी मंत्रियों की चिंताएं उनके अपने कार्यक्षेत्र से जुड़ी हुई हैं? प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनेवाले और उनका अंधाधुंध दोहन करनेवाले क्या एक साथ हो सकते हैं? दृष्टियों, विचारों, धारणाओं, लगावों, सिद्धांतों, व्यवहारों, कार्यप्रणालियों, संप्रभुताओं आदि के आधार पर आवाजें बदलती हैं. मानस-निर्माण का कार्य सबसे बड़ा है और अब भारत का कोई भी शिक्षण-संस्थान और विश्वविद्यालय पूर्णत: जनोन्मुखी मानस का निर्माण नहीं करता.
संस्थाएं इसी कारण अविश्वसनीय हो गयी हैं. अविश्वसनीयता विगत दो दशकों में सर्वाधिक बढ़ी है, जिसका सीधा संबंध शब्द और कर्म की विपरीतता से है. शब्दों का प्रोफाइल आज सर्वाधिक है, पर कर्म (सामाजिक) की हलचल कम है. कागज पर लिखे, टंकित, मुद्रित शब्द प्रमुख है. सभी आदिवासियों के पास उनकी जमीन के कागज नहीं हैं.
वे वनों में रहते हैं और उनके पास कोई कागजी प्रमाण नहीं है. भारतीय लोकतंत्र कामकाजी नहीं कागजी बन कर रह गया है. इसके दो चेहरे हैं. भारतीय लोकतंत्र, भारतीय राजनीति के दो चहरे- जिनमें छद्म और वास्तविक की पहचान आसान नहीं है. अभी लगभग एक सप्ताह पहले रामचंद्र गुहा ने भुमंडलीकरण के दो चेहरे शीर्षक के अपने लेख में मंगलूर के साफ्टवेयर उद्योग और वेल्लारी के खान उद्योग में दिन-रात का अंतर देखा है.
एक कर्नाटक के दो चेहरे. एक ओर इंफोसिस है और दूसरी ओर गैर कानूनी ढंग से विगत एक दशक में कर्नाटक से तीन करोड़ टन लौह अयस्क के निर्यातक वेल्लारी में जंगल नष्ट हुए हैं, पानी के सोते सूखे हैं और नदियां प्रदूषित हुई हैं. वहां के खान उद्योगपति की मु_ी में राजनीति, प्रशासन सब कुछ है. रामचंद्र गुहा ने अपने लेख में पूंजीवाद के प्रगतिशील और पतनशील पों की चर्चा की है.
क्या राजकीय पूंजीवाद की निजी-निगमीय पूंजीवाद की सांठ-गांठ से कोई सार्थक परिणाम निकल सकता है? क्या अब सब कुछ निजी पूंजी के हवाले कर दिया जाना चाहिए? फिर छोटी पूंजी का क्या होगा? क्या बड़ी मछलियां सभी छोटी मछलियों को निगल लेंगी? क्या आवाजों की भिन्नता बची रहेगी? क्या भारतीय लोकतंत्र एक स्वस्थ और आदर्श लोकतंत्र रहेगा? क्या इस लोकतंत्र में लोक की आवाज सुनी जायेगी?
वीरान होते गांव, सजते शहर
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2050 तक 70 प्रतिशत शहरी संयुक्त राष्ट्र हैबिटाट की रिपोर्ट में शहरों को आर्थिक विकास का इंजन बताया गया है, क्योंकि शहरीकरण को औद्योगिकरण से जुड़ा बताया गया है.
2050 तक 70 प्रतिशत शहरी संयुक्त राष्ट्र हैबिटाट की रिपोर्ट में शहरों को आर्थिक विकास का इंजन बताया गया है, क्योंकि शहरीकरण को औद्योगिकरण से जुड़ा बताया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि आज दुनिया की आधी जनसंख्या शहरों में रह रही है. अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह अनुपात बढ़कर 70 प्रतिशत हो जायेगा.
उस समय विकसित देशों की 14 प्रतिशत और विकासशील देशों की मात्र 33 प्रतिशत जनसंख्या शहरी सीमा से बाहर होगी. शहरीकरण की गति विकासशील देशों में सबसे तेज है. यहां प्रति माह पचास लाख लोग शहरों में आ जाते हैं. विश्व में शहरीकरण में वृद्धि के 95 फ़ीसदी का कारण यही है. शहरीकरण में वृद्धि कई कारकों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है.
जैसे भौगोलिक स्थिति, जनसंख्याई वृद्धि, ग्रामीण-शहरी प्रवास, राष्ट्रीय नीतियां, आधारभूत ढांचा, राजनीतिक-सामाजिक-ओर्थक परिस्थितियां. वर्ष 1990 के दशक में विकासशील देशों में शहर 2.5 प्रतिशत वार्षिक की गति से बढ़ रहे थे, लेकिन इसके बाद उदारीकरण, भूमंडलीकरण ने विकासशील देशों में शहरीकरण को तेजी से बढ़ाया. विशेषज्ञों के अनुसार विकासशील देशों में शहरीकरण की गति तभी धीमी पड़ेगी, जब अफ्रीका और ऐशया के ग्रामीण बहुल क्षेत्र शहरी केंद्रों में बदल जायेंगे.
वर्ष 2050 तक विकासशील देशों की शहरी जनसंख्या 5.3 अरब हो जायेगी, जिसमें अकेले ऐशया की भागीदारी 63 प्रतिशत यानि 3.3 अरब की होगी. 1.2 अरब लोगों के साथ अफ्रीका दुनिया की एक-चौथाई शहरी जनसंख्या होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़े-बड़े महानगर अब आपस में मिलकर वृहद महानगर या मेगा रीजन बना रहे हैं. जैसे चीन में हांगकांग-शेनजेन-ग्वोझाऊ, जापान में नगोया-ओसाका-क्योलटो और भारत में भी मुंबई व दिल्ली आसपास के शहरों से जुड़कर बृहद महानगर बन रहे हैं.
विकासशील और विकसित देशों के शहरीकरण में एक मूलभूत अंतर यह है कि जहां विकसित देशों में उद्योग व सेवा क्षेत्र के विस्तार और व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के कारण शहरी क्षेत्र बेरोजगारी व झुग्गी-झोपडिय़ों से मुक्त रहे, वहीं विकासशील देशों में स्थिति इसके विपरीत है.
विकसित देश ऊंची उत्पादकता, संसाधनों की तुलना में कम आबादी, औद्योगिकरण, मशीनीकृत खेती ओद माध्यमों से शहरों में बसी जनसंख्या को रोजी-रोटी मुहैया कराने में सफ़ल हुए, लेकिन विकासशील देशों में ऐसी स्थिति नहीं है. इन देशों में उत्पादक जनसंख्या के प्रवास से गावों में बुजुर्ग व महिलाओं की संख्या बढ़ी, जिससे कृषि कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. यही कारण है कि खाद्यान्न पैदा करने वाले परिवार अब खरीदकर खा रहे हैं.
विकासशील देशों में बढ़ती भुखमरी व महंगाई का एक बड़ा कारण यही है. इस समय विकास के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती गरीबी का शहरीकरण रोकने की है.
विकसित देशों की भांति शहरीकरण के लिए जिस बड़े पैमाने पर संसाधनों की जरूरत होती है, उसका विकासशील देशों के पास अभाव है. अभी जो शहरीकरण का स्तर है, उसमें भी जल-मल निकासी, गंदे पानी के शोधन, पार्किंग, पेयजल, आवास, अस्पताल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. यहां सिफऱ् बिजली, सड़क, पानी का ही बुनियादी अभाव नहीं है, बल्कि बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन और आधुनिक सुविधाओं की चीजें भी अनुपस्थित हैं.
विकासशील देशों की बहुसंख्यक आबादी का आधार कृषि एवं ग्रामीण जीवन है. ऐसे में विकासशील देशों को चाहिए कि वे शहरीकरण की बजाये आधुनिकीकरण,यंत्रीकरण तथा प्रौद्योगिकरण पर अधिक बल दें. इन देशों में गावों व कस्बों में फ़ैक्टरी लगाने,औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और स्वरोजगार के साधन मुहैया कराने की जरूरत है.
गावों के विकास के लिए इस तरह की योजना बने कि ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बिजली और पेयजल उपलब्ध हो.
दुनिया की तुलना में जनसंख्या
भारत की आबादी 2001 की जनणना में एक अरब के आंकड़े को पार कर 102.87 करोड़ हो गयी थी.
हालांकि जनसंख्या की औसत वार्षिक वृद्धि दर वर्ष 2001 में कम होकर 1.95 प्रतिशत रह गयी. इसके बावजूद भारत की जनसंख्या की वृद्धि दर विकसित देशों की तुलना में ही नहीं, बल्कि विकासशील देशों की तुलना में भी बहुत अधिक है. वर्ष 2007 में विश्व जनसंख्या 6,612 मिलियन थी, जिसमें भारत की जनसंख्या लगभग 1,123 मिलियन थी. इस हिसाब से विश्व की कुल जनसंख्या में भारत का हिस्सा 16.98 प्रतिशत है.
भारत में वर्ष 2000-07 में जनसंख्या की औसत वार्षिक वृद्धि दर 1.4 प्रतिशत थी जो विश्व औसत वार्षिक वृद्धिदर (1.2 प्रतिशत) से अधिक है. चीन की जनसंख्या वर्ष 2007 में 1,320 मिलियन थी. चीन की वर्ष 2000-07 में जनसंख्या की औसत वार्षिक वृद्धिदर 0.6 प्रतिशत थी जो विश्व जनसंख्या की औसत वृद्धि दर का आधा था. हालांकि, भारत की जनसंख्या वृद्धि दर कई देशों की तुलना में कम है, किंतु ऐसे देश जनसंख्या के आकार में छोटे हैं.
पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश की जनसंख्या वृद्धिदर भारत से बहुत अधिक है. विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रण में है, जबकि विकासशील देशों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है. भारत में जनसंख्या की वर्तमान वृद्धि दर को देखते हुए भविष्य में जनसंख्या के आकार में चीन से आगे निकल जाने की संभावना है.
दो बच्चों के नियम को लेकर विवाद
जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाये गये कानून को लेकर विवाद है. जनसंख्या नियंत्रण के सवाल पर भारत में लंबे समय से विवाद चल रहा है.
नया विवाद यह है कि क्या दो से अधिक बच्चे वाले लोगों को चुनाव लडऩे से रोकना ठीक है? कई लोग पंचायत स्तर पर लागू दो बच्चों के क़ानून को अलोकतांत्रिक मानते हैं. ये क़ानून राजस्थान और हरियाणा में 1994 से लागू है. इसके बाद चार और राज्यों आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, ओडि़सा और मध्यप्रदेश में इसे लागू किया गया है. इस क़ानून के मुताबिक वो व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता, जिसके क़ानून के अनुसार निर्धारित निश्चित तारीख के बाद दो से अधिक बच्चे हैं. इसके अनुसार अगर किसी के पद रहते दो से अधिक बच्चे होते हैं, तो उसे पद से हटाने का भी प्रावधान है. जहां तक दो बच्चों वाले क़ानून को पंचायत में लागू करने की बात है, पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि एक तो यह व्यावहारिक नहीं, दूसरा लोकतांत्रिक रूप में भी गलत है.महिलाओं पर असरसविंधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायत में महिलाओं की भागीदारी 33 फ़ीसदी तक कर दी गयी.
इस क़ानून से सबसे अधिक नुक़सान महिलाओं को होने की बात कही जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत दो बच्चों वाले नियम का सबसे ज्यादा असर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर हो रहा है. अक्सर महिलाओं, ख़ासतौर पर ग्रामीण महिलाओं के पास परिवार नियोजन के साधन अपनाने का अधिकार नहीं होता. ऐसी स्थिति में पति की मर्जी पर निर्भर महिलाओं पर इस नियम का ख़ासा असर पड़ रहा है.
नीति का सवाल
भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000 में भी बलपूर्वक जनसंख्या बढ़ोतरी को रोकने के बजाय स्वेच्छा से अपनाने का विकल्प दिया गया है. साथ ही एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की बात भी कही गयी है. जानकारों का मानना है कि दो बच्चों की नीति दरअसल जनसंख्या नीति के इस सिद्धांत की अनदेखी है. जितनी औरतें भारत में गर्भपात के कारण मरती हैं, उतनी यूरोप में एक साल में नहीं मरतीं. लोगों को ऐसा विकल्प मिले जिसके बारे में उनके पास जानकारी हो.
लोगों को विकल्प मिले कि वह किस तरह के परिवार नियोजन साधन अपनाना चाहते हैं. अगर स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तो यह कैसे मुमकिन है. वही इस नियम का समर्थन कर रहे जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000 के अनुसार दस साल में जनसंख्या का स्थायीकरण शुरू हो जाना चाहिए और 2045 में जनसंख्या स्थायीकरण पूरा हो जाना चाहिए और ये तभी संभव है, जब केवल दो बच्चों का परिवार हो.
यदि हम बड़े परिवार की बात करेंगे, तो हम कभी भी जनसंख्या का स्थायीकरण नहीं कर सकते. चीन में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी. परिवार नियोजन जब वहां चलाया गया, तो वहां पर परिवार का आकार छोटा करते-करते एक बच्चे तक पहुंच गये. हालांकि, कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये. लेकिन वहां जनसंख्या का स्थायीकरण हुआ.
हरियाणा के एकमात्र शक्तिपीठ श्रीदेवीकूप (भद्रकाली) मंदिर का महत्व सर्वविदित
धर्मनगरी के नाम से भी विख्यात कुरुक्षेत्र के 48 कोस के क्षेत्र में विभिन्न मंदिर स्थित है, जो काफी प्रसिद्ध है। इन्हीं मंदिरों में श्रीदेवीकूप (भद्रकाली )मंदिर मां सती के बावन शक्तिपीठों में शोभायान है। यहां प्रत्येक शनिवार व नवरात्र महोत्सव में श्रद्धालुओं की इम्तिहां भीड़ होती है। शास्त्रानुसार दक्ष यज्ञ में अपने पति भगवान शंकर की निंदा व अपमान देख-सुनकर भगवती सती ने अपने प्राणों को त्याग दिया। भगवान शिव उनके शव को हृदय से लगाए उन्मत्त की भांति ब्राह्मांड का चक्कर लगाने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से महाशक्ति के निवास स्थान मृत शरीर को बावन भागों में विभाजित कर लोक कल्याण के लिए पावन शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित किया। नैना देवी, कामाख्या देवी, ज्वाला जी इत्यादि सभी बावन शक्तिपीठ मां के प्रिय निवास स्थल हैं। हरियाणा के एकमात्र शक्तिपीठ श्रीदेवीकूप (भद्रकाली) मंदिर का महत्व सर्वविदित है। पावन श्रीदेवीकूप पर स्थित सती जी का दाया चरण (टखना) मंदिर के इतिहास को बार-बार दोहाराता है। तंत्र-चूड़ामणि के अनुसार कुरुक्षेत्र च गुल्फत:। स्थाणुर्नाम च सावित्री।। इसी शक्तिपीठ पर महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने विजय कामना के लिए मां काली का पूजा-अर्चन किया। श्रीकृष्ण व श्री बलराम का मुंडन संस्कार भी इसी शक्तिपीठ में हुआ। इस शक्तिपीठ की महिमा अपार है।
कुरुक्षेत्रे परो गुल्फ
सावित्री स्थाणु भैरवम्।
गत्वा सुशोभते नित्यं
देव्या: पीठो महान्भुवि।।
मां भद्रकाली मंदिर में मां भद्रकाली की शांतस्वरूप व वस्त्राभरणभूषित, चतुर्भुज कृष्णवर्णयुक्त वरमुद्रा में भव्य विलक्षण प्रतिमा सुशोभित है। गणों के रूप में दक्षिणमुखी हनुमान जी, गणेश जी व भैरव जी विराजमान है। ऊपर मंदिर में मां वैष्णो की सौम्य प्रतिमा व पिंडी स्वरूप आदि शक्ति प्रतिष्ठित है। शिव परिवार में अद्भुत शिवलिंग हैं, जिसमें प्राकृतिक रूप से ललाट तिलक एवं सर्पानुभूति होती है। उत्कृष्ट कलात्मक चक्रव्यूह भी बना हुआ है। हजारों वर्षों से मां की सेवा में स्थित वट-वृक्ष के सान्निध्य में बैठकर अनेक संत महात्माओं ने अभीष्ट सिद्धि का लाभ प्राप्त किया है। मंदिर के दक्षिण में एक अत्यंत सुंदर एवं रेलिंगयुक्त पक्का पावन देवी तालाब मंदिर की शोभा बढ़ाता है, जिसके उत्तरी-पश्चिमी किनारों पर सूर्य-यंत्र तथा दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है। मां का दिव्य कांतियुक्त, तेजोमय स्वरूप, अखंड प्रज्ज्वलित ज्योति के रूप में सदा-सदा से मुख्य मंदिर में प्रतिष्ठित है, जिसके दर्शन मात्र से भक्तों का कल्याण संभव है। बड़े-बड़े महात्माओं ने इस पावन शक्तिस्थल श्री देवीकूप (भद्रकाली) मंदिर में अराधना करके भगवती की कृपा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त की है। मां अपने लाड़ले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। आप भी शुद्ध मन से इस शक्तिपीठ पर मां भद्रकाली से प्रार्थना करें। मां आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगी।
मनोकामनां पूर्ण होने पर मां की भेंट में (सोना, चांदी अथवा मिट्टी) का घोड़ा चढ़ाने की ऐतिहासिक प्रथा है। पूजा के लिए नवरात्रों तथा शनिवार का विशेष महत्व है। दानी सज्जनों के सहयोग से यात्रियों के ठहरने के लिए आधुनिक धर्मकक्ष निर्माण किया गया है। मुख्यद्वार तथा रेलिंगयुक्त पक्की सड़क निर्माण से मार्ग सौंदर्यकरण में वृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है।
वर्ष 2000 में 108 फीट ऊंचे शिखर का निर्माण करते समय पुरातन मंदिर की नींव से कुछ दुर्लभ कृतियां प्राप्त हुई थी, जो मंदिर में अवलोकन के लिए रखी गई हैं। शक्तिपीठ में नवरात्र महोत्सव के दौरान देश-दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं। अभी तक शक्तिपीठ में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, कई मुख्यमंत्री, राज्यपाल व केंद्रीय मंत्रियों, आलाधिकारियों सहित देश-विदेश की कई विभूतियां निभा चुके हैं घोड़े अर्पित करने की पंरपरा। पीठाध्यक्ष पंडित सतपाल शर्मा बताते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजयश्री के बाद घोड़े चढ़ाए थे। शक्तिपीठ में और यह उल्लेख पुराणों में मिलता है।
सूचना का अधिकार
बीसवीं सदी में आज मनुष्य के हाथ जिस का नाम (आरटीआई) सूचना का अधिकार जैसा हथियार लग गया है जो देशवासियों के लिए ब्रह्मास्त्र साबित हो रहा है. वैसे तो देश में लोकतंत्र आजादी से पहले से ही जन्म ले चुका है लेकिन असली आजादी इस अधिकार रूपी हथियार के रूप में अब मिली है. हम 70-75 वर्ष पहले के भारत को देखें तो हर व्यक्ति अपने अधिकार को एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में सौंप देता था जिसे राजा कहा जाता था. उस समय भी मानव स्वतंत्र तो था, लेकिन अपने राजा के आगे उसे अपने हक व अधिकार का उपयोग करना एक तरह से मना ही था. अंग्रेजों के आने के बाद देश की शासन व प्रशासन प्रणाली वैसी नहीं रही और अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद देश की शासन व प्रशासन प्रणाली फिर बदली. ठीक उसी तरह 12 अक्टूबर 2005 को देश के हर व्यक्ति को मानवाधिकार प्राप्त हुआ जिसका नाम सूचना का अधिकार (आरटीआई) है. इस अधिकार के प्राप्त होते ही देश में एक नए लोकतंत्र का उदय हुआ.
सूचना के अधिकार के माध्यम से देश के हर नागरिक को देश व प्रदेशों के शासन व प्रशासन से उसके कार्य को लेकर व नागरिक से जुड़े हर पहलू के बारे में सवाल करने के लिए नई लोकतांत्रिक भूमिका में ला खड़ा कर दिया है. इस अधिकार के तहत देश के हर नागरिक को अपने प्रलंबित कामों के लिए सरकारी दफ्तरी बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाने की आवश्यकता नहीं रही. अगर आप का काम नहीं हुआ तो आप सरकारी कर्मचारी व बड़े अधिकारी तक को अपने सवालों के घेरे में लेकर उनसे पूछ सकते हैं कि आपने मेरा काम क्यों नहीं किया. इस बात को कहने में भी संकोच नहीं रहा कि आपको महीने भर की पगार किस काम की दी जाती है? यही सूचना का अधिकार ब्रह्मास्त्र बनकर हर नागरिक के हाथ लगा है जिसके आगे हर कोई नतमस्तक है.
लेकिन यह कानून लागू क्यों हुआ? आज कई लोगों के दिमाग को यह बात सुन्न कर चुकी है. असल में सूचना का अधिकार देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने का नाम है. भ्रष्टाचार नामक दीमक को नष्ट करना है जो देश की जड़ों में लग चुकी है और हर साख तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. वैसे तो स्वीडन विश्व का पहला देश है जिसने 240 वर्ष पहले सूचना का अधिकार लागू किया था. वहीं 1766 को (फ्रीडम ऑफ प्रैस) एक्ट पारित हुआ था. उसके बाद फिनलैंड में 1959 को कानून के रूप में सूचना का अधिकार लागू हुआ. उसके बाद अमेरिका में 1966 में कानून लागू हुआ. इसी तरह हर दो-तीन वर्षों के बाद विदेशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा, न्यूजीलैंड आदि देशों में सूचना का अधिकार लागू हुआ था.
भारत में सिर्फ राजस्थान पहला राज्य है जिसने सूचना का अधिकार लागू करने की कोशिश की. यहां पर मजदूर संगठनों ने मिलकर आंदोलन किया और देश में पहला कानून सूचना का अधिकार राजस्थान की बजाय तमिलनाडू में 17 अप्रैल 1997 को लागू हुआ. इसके तीन महीने बाद गोवा, उसके बाद मध्य प्रदेश, 2000 को कर्नाटक व 2001 में दिल्ली के बाद महाराष्ट्र में 2002 को सूचना का अधिकार लागू हुआ. यह कानून बनाने के लिए राजस्थान के निखिल डे, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल व महाराष्ट्र के अन्ना हजारे ने बहुत बड़ा योगदान दिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने पूरे देश में 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून सूचना का अधिकार लागू कर दिया. कानून के लागू होते ही कई शहरों व विभागों में हड़कंप मच गया. कुछ लोगों के खुशी से चेहरे लाल हो गए और कुछ बगलें झांकने को मजबूर हुए.
लेकिन आरटीआई है क्या और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, अभी तक पूरी तरह से मालूम नहीं था. मगर फिर भी देश के हर एक व्यक्ति को इसकी परिभाषा का ज्ञान एक दूसरे के माध्यम से हो रहा है, आज देश में कई बड़े शहरों में सूचना का अधिकार के नाम से संगठन, बड़े क्लब व कई समूह बन चुके हैं. जिनके माध्यम से नागरिकों को सूचना अधिकार का सही उपयोग बताया जा रहा है. इतना होने के बावजूद इसका सही उपयोग कुछ प्रतिशत ही हो रहा है. कुछ लोगों की सोच तो बिल्कुल इस कानून के विपरीत होती नजर आ रही है.
अगर अपने विभाग में किसी कर्मचारी की अपने अधिकारी से अच्छी बनती है या फिर अधिकारी के किसी मशहूर नेता से अच्छे संबंध हैं, उसके यहां आना जाना है तो उसी विभाग का कोई कर्मचारी झट से आरटीआई आवेदक के पास पहुंच जाता है और अपनी विभाग की कई जानकारियां देते हुए विभाग में कर्मचारी, अधिकारी या विभाग से जुड़ी जानकारियां प्राप्त करने के लिए आवेदन करवाता है. और फिर जब तक उस विभाग से जानकारी नहीं आ जाती तब तक कर्मचारी की आंखें विभाग के हर कर्मचारी की हरकतों पर गड़ी रहती है. अपने कार्य की तरफ कम और दूसरे की हरकतों पर ज्यादा ध्यान रहता है ऐसा क्यों? शायद इसीलिए कि जिस कर्मचारी के माध्यम से सूचना के अधिकार में सूचना मिली है, उस कर्मचारी को उसके हक(अपनी तरफ से बना लिए गए सुविधा शुल्क) की सही कीमत नहीं मिली होगी, या फिर विभाग में जितना पैसा आया था उसमें से कुछ प्रतिशत हिस्सा बड़े अधिकारी ने अपने हित के लिए खर्च कर लिया होगा और जिसके बंटवारे में वह कर्मचारी भी माल कूटना चाहता होगा जिसने आरटीआई के माध्यम से जानकारी लेने के लिए आवेदन करवाया है. अब अधिकारी की तो वाट लग गई. ऐसे ही कई मामले बड़े देशों से लेकर छोटे शहरों तथा गांवों तक में सामने आ रहे है. कई विभागों व संस्थाओं की सूचना प्राप्त करने के बाद कुछ भी घोटाला या भ्रष्टाचार जैसा साबित कुछ भी नहीं होता. मगर विभाग की 15 से 20 दिनों तक जान आफत में आ जाती है.
आज देश में ग्रामीण रोजगार के तहत देश के देहाती बड़े-छोटे शहरों व गांव में मनरेगा का कार्य जोर-शोर से चल रहा है और इसका फायदा गांव में रहने वाले काफी लोगों को हुआ है. इससे रोजगार भी मिला, धन भी मिला, साथ ही साथ अपने ही गांव में पानी, स्कूल तथा सड़कों का कई प्रकार से विकास हुआ. जो लोग रोजगार कमाने के लिए घर से बाहर जाते थे उन्हें अब मनरेगा में घर पर ही रोजगार मिल रहा है. इस कार्य में सबसे ज्यादा महिलाएं आगे आई हैं. जिन महिलाओं ने कभी रुपयों को अपने हाथ में पकड़ कर ठीक ढंग से नहीं देखा था उन्होंने भी धन राशि एकत्रित करना सीख लिया है, लेकिन नरेगा में जितना ज्यादा धन और रोजगार है इसमें उतना ही भ्रष्टाचार भी पनप रहा है. मनरेगा में हुई धांधलियों का पर्दाफाश भी तो सूचना अधिकार के कारण ही हुआ है. इतना ही नहीं कई पंचायत कर्मचारियों के साथ-साथ प्रधानों को भी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाने पर अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है.
बहुत से आरटीआई आवेदक इसकी सही जानकारी प्राप्त करके दूसरे लोगों को जागरूक करने की बजाय इसका उपयोग भ्रष्टाचार फैलाने में कर रहे हैं. आज देश में सैंकड़ों विभाग ऐसे हैं जिनकी कार्यशैली पर किसी ने आज तक आंख तक नहीं उठाई है और इन विभागों में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ लोग आरटीआई के माध्यम से विभागों की जानकारी प्राप्त कर पकड़ेे जाने पर बड़े अधिकारी से सांठगांठ करके भ्रष्टाचार के ऊपर पड़े परदे को उठाने के बजाय भ्रष्टाचार पर और परदा डाल रहे हैं. यह आरटीआई का उपयोग है या दुरूपयोग इस बात को भलीभांति जाना जा सकता है।
आज ज्यादातर लोग आरटीआई का उपयोग अपनी पैंशन, ऐरियर, प्रोमोशन या अपनी महीनेभर के पगार को बढ़ाने मात्र के लिए कर रहे हैं. लेकिन आरटीआई अपने हित के साथ-साथ जनता के कार्यहित में उपयोग लाने वाले कानून का नाम है न कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए. आरटीआई के माध्यम से हम अपने गांव या शहर में आने वाले पैसों का सही उपयोग जान सकते हैं. धनराशि जनता के कार्य में लग रही है कि नहीं, यह जानकारी सूचना अधिकार के माध्यम से ले सकते हैं तथा किसी भी विभाग में होने वाले घोटाले या भ्रष्टाचार को खत्म करने में आरटीआई सक्षम है. देश में आरटीआई के माध्यम से हजारों लोगों के साथ-साथ विभागों और प्रशासन को भी फायदा हुआ हैं. विभागों में बैठे हुए कई भ्रष्ट कर्मचारियों को भी आरटीआई की माध्यम से ही पकड़ा गया है. आज देश के जरूरतमंदों को अनाज, मकान व रोजगार तक आरटीआई के माध्यम से ही प्राप्त हुआ है. कई गांवों को अपना अधिकार मिला है और इन गांव में वर्षों से रुकी हुई कार्ययोजना को भी आरटीआई के माध्यम से नया रूप मिला है, लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक अभी भी कई विभागों में सरकारी धन व जनता के अधिकारों को चाटने में लगी हुई है, जिसको बाहर निकाल फेेंकना अति आवश्यक है.
सूचना के अधिकार के माध्यम से देश के हर नागरिक को देश व प्रदेशों के शासन व प्रशासन से उसके कार्य को लेकर व नागरिक से जुड़े हर पहलू के बारे में सवाल करने के लिए नई लोकतांत्रिक भूमिका में ला खड़ा कर दिया है. इस अधिकार के तहत देश के हर नागरिक को अपने प्रलंबित कामों के लिए सरकारी दफ्तरी बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाने की आवश्यकता नहीं रही. अगर आप का काम नहीं हुआ तो आप सरकारी कर्मचारी व बड़े अधिकारी तक को अपने सवालों के घेरे में लेकर उनसे पूछ सकते हैं कि आपने मेरा काम क्यों नहीं किया. इस बात को कहने में भी संकोच नहीं रहा कि आपको महीने भर की पगार किस काम की दी जाती है? यही सूचना का अधिकार ब्रह्मास्त्र बनकर हर नागरिक के हाथ लगा है जिसके आगे हर कोई नतमस्तक है.
लेकिन यह कानून लागू क्यों हुआ? आज कई लोगों के दिमाग को यह बात सुन्न कर चुकी है. असल में सूचना का अधिकार देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने का नाम है. भ्रष्टाचार नामक दीमक को नष्ट करना है जो देश की जड़ों में लग चुकी है और हर साख तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. वैसे तो स्वीडन विश्व का पहला देश है जिसने 240 वर्ष पहले सूचना का अधिकार लागू किया था. वहीं 1766 को (फ्रीडम ऑफ प्रैस) एक्ट पारित हुआ था. उसके बाद फिनलैंड में 1959 को कानून के रूप में सूचना का अधिकार लागू हुआ. उसके बाद अमेरिका में 1966 में कानून लागू हुआ. इसी तरह हर दो-तीन वर्षों के बाद विदेशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा, न्यूजीलैंड आदि देशों में सूचना का अधिकार लागू हुआ था.
भारत में सिर्फ राजस्थान पहला राज्य है जिसने सूचना का अधिकार लागू करने की कोशिश की. यहां पर मजदूर संगठनों ने मिलकर आंदोलन किया और देश में पहला कानून सूचना का अधिकार राजस्थान की बजाय तमिलनाडू में 17 अप्रैल 1997 को लागू हुआ. इसके तीन महीने बाद गोवा, उसके बाद मध्य प्रदेश, 2000 को कर्नाटक व 2001 में दिल्ली के बाद महाराष्ट्र में 2002 को सूचना का अधिकार लागू हुआ. यह कानून बनाने के लिए राजस्थान के निखिल डे, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल व महाराष्ट्र के अन्ना हजारे ने बहुत बड़ा योगदान दिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने पूरे देश में 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून सूचना का अधिकार लागू कर दिया. कानून के लागू होते ही कई शहरों व विभागों में हड़कंप मच गया. कुछ लोगों के खुशी से चेहरे लाल हो गए और कुछ बगलें झांकने को मजबूर हुए.
लेकिन आरटीआई है क्या और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, अभी तक पूरी तरह से मालूम नहीं था. मगर फिर भी देश के हर एक व्यक्ति को इसकी परिभाषा का ज्ञान एक दूसरे के माध्यम से हो रहा है, आज देश में कई बड़े शहरों में सूचना का अधिकार के नाम से संगठन, बड़े क्लब व कई समूह बन चुके हैं. जिनके माध्यम से नागरिकों को सूचना अधिकार का सही उपयोग बताया जा रहा है. इतना होने के बावजूद इसका सही उपयोग कुछ प्रतिशत ही हो रहा है. कुछ लोगों की सोच तो बिल्कुल इस कानून के विपरीत होती नजर आ रही है.
अगर अपने विभाग में किसी कर्मचारी की अपने अधिकारी से अच्छी बनती है या फिर अधिकारी के किसी मशहूर नेता से अच्छे संबंध हैं, उसके यहां आना जाना है तो उसी विभाग का कोई कर्मचारी झट से आरटीआई आवेदक के पास पहुंच जाता है और अपनी विभाग की कई जानकारियां देते हुए विभाग में कर्मचारी, अधिकारी या विभाग से जुड़ी जानकारियां प्राप्त करने के लिए आवेदन करवाता है. और फिर जब तक उस विभाग से जानकारी नहीं आ जाती तब तक कर्मचारी की आंखें विभाग के हर कर्मचारी की हरकतों पर गड़ी रहती है. अपने कार्य की तरफ कम और दूसरे की हरकतों पर ज्यादा ध्यान रहता है ऐसा क्यों? शायद इसीलिए कि जिस कर्मचारी के माध्यम से सूचना के अधिकार में सूचना मिली है, उस कर्मचारी को उसके हक(अपनी तरफ से बना लिए गए सुविधा शुल्क) की सही कीमत नहीं मिली होगी, या फिर विभाग में जितना पैसा आया था उसमें से कुछ प्रतिशत हिस्सा बड़े अधिकारी ने अपने हित के लिए खर्च कर लिया होगा और जिसके बंटवारे में वह कर्मचारी भी माल कूटना चाहता होगा जिसने आरटीआई के माध्यम से जानकारी लेने के लिए आवेदन करवाया है. अब अधिकारी की तो वाट लग गई. ऐसे ही कई मामले बड़े देशों से लेकर छोटे शहरों तथा गांवों तक में सामने आ रहे है. कई विभागों व संस्थाओं की सूचना प्राप्त करने के बाद कुछ भी घोटाला या भ्रष्टाचार जैसा साबित कुछ भी नहीं होता. मगर विभाग की 15 से 20 दिनों तक जान आफत में आ जाती है.
आज देश में ग्रामीण रोजगार के तहत देश के देहाती बड़े-छोटे शहरों व गांव में मनरेगा का कार्य जोर-शोर से चल रहा है और इसका फायदा गांव में रहने वाले काफी लोगों को हुआ है. इससे रोजगार भी मिला, धन भी मिला, साथ ही साथ अपने ही गांव में पानी, स्कूल तथा सड़कों का कई प्रकार से विकास हुआ. जो लोग रोजगार कमाने के लिए घर से बाहर जाते थे उन्हें अब मनरेगा में घर पर ही रोजगार मिल रहा है. इस कार्य में सबसे ज्यादा महिलाएं आगे आई हैं. जिन महिलाओं ने कभी रुपयों को अपने हाथ में पकड़ कर ठीक ढंग से नहीं देखा था उन्होंने भी धन राशि एकत्रित करना सीख लिया है, लेकिन नरेगा में जितना ज्यादा धन और रोजगार है इसमें उतना ही भ्रष्टाचार भी पनप रहा है. मनरेगा में हुई धांधलियों का पर्दाफाश भी तो सूचना अधिकार के कारण ही हुआ है. इतना ही नहीं कई पंचायत कर्मचारियों के साथ-साथ प्रधानों को भी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाने पर अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है.
बहुत से आरटीआई आवेदक इसकी सही जानकारी प्राप्त करके दूसरे लोगों को जागरूक करने की बजाय इसका उपयोग भ्रष्टाचार फैलाने में कर रहे हैं. आज देश में सैंकड़ों विभाग ऐसे हैं जिनकी कार्यशैली पर किसी ने आज तक आंख तक नहीं उठाई है और इन विभागों में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ लोग आरटीआई के माध्यम से विभागों की जानकारी प्राप्त कर पकड़ेे जाने पर बड़े अधिकारी से सांठगांठ करके भ्रष्टाचार के ऊपर पड़े परदे को उठाने के बजाय भ्रष्टाचार पर और परदा डाल रहे हैं. यह आरटीआई का उपयोग है या दुरूपयोग इस बात को भलीभांति जाना जा सकता है।
आज ज्यादातर लोग आरटीआई का उपयोग अपनी पैंशन, ऐरियर, प्रोमोशन या अपनी महीनेभर के पगार को बढ़ाने मात्र के लिए कर रहे हैं. लेकिन आरटीआई अपने हित के साथ-साथ जनता के कार्यहित में उपयोग लाने वाले कानून का नाम है न कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए. आरटीआई के माध्यम से हम अपने गांव या शहर में आने वाले पैसों का सही उपयोग जान सकते हैं. धनराशि जनता के कार्य में लग रही है कि नहीं, यह जानकारी सूचना अधिकार के माध्यम से ले सकते हैं तथा किसी भी विभाग में होने वाले घोटाले या भ्रष्टाचार को खत्म करने में आरटीआई सक्षम है. देश में आरटीआई के माध्यम से हजारों लोगों के साथ-साथ विभागों और प्रशासन को भी फायदा हुआ हैं. विभागों में बैठे हुए कई भ्रष्ट कर्मचारियों को भी आरटीआई की माध्यम से ही पकड़ा गया है. आज देश के जरूरतमंदों को अनाज, मकान व रोजगार तक आरटीआई के माध्यम से ही प्राप्त हुआ है. कई गांवों को अपना अधिकार मिला है और इन गांव में वर्षों से रुकी हुई कार्ययोजना को भी आरटीआई के माध्यम से नया रूप मिला है, लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक अभी भी कई विभागों में सरकारी धन व जनता के अधिकारों को चाटने में लगी हुई है, जिसको बाहर निकाल फेेंकना अति आवश्यक है.
123 साल का हमला
बाडमेर पश्चिम राजस्थान का सीमावर्ती जिला बाडमेर अपनी लोक कला और संस्कृति के लिऐं जाना जाता हैं। यह सीमावर्ती जिला अपने खास खान ,पान,रहन-सहन और जिन्दा दिल्ली के लियें भी खास तौर से जाना जाता हैं। इस जिले के लोग अपनी शारीरिक बनावट,कद काठी के लिये मशहूर हैं। इस सीमावर्ती जिले के रामसर तहसील के अजबानी गांव कें निवासी हमला पुत्र जीया नें 123 बसंत पार कर लिऐं सम्भवत: हमला राजस्थान में सबसे अधिक आयु का जिन्दा व्यक्ति हैं। लगभग 253 सदस्यों कें परिवार का मुखिया हमला इस उम्र में भी बहुत जिन्दा दिल हैं। इसी क्षैत्र में दो महिला सहित चार शतकवीर हैं।इनमें से एक क्षेत्रिय विधायक की माताफातमा पत्नी दीना खान 106 साल,चनेसर खान 113 साल निवासी लाखेटाली हैं।वहीं 108 साल की श्रीमति वलिया पत्नी अदरीम निवासी सियाई तो आज भी घर के कामकाज निपटा रही हैं।जिला मुख्यालय सें लगभग 70 किलोमीटर दूर रामसर तहसील के गांव अजबानी से एक किमी दूर एक ढाणी के झोंपडे के बाहर खाट पर एक बुजुर्ग बैठा हैं।हाथ में लाठी लिऐं बकरियों को चरा रहा हैं।ये हैं 123 साल का राजस्थान का सम्भवत: यबसे बुजुर्ग व्यक्ति हमला पुत्र जीया।253 सदस्यों के परिवार का मुखिया हमला की सबसे बडी पुत्री अमरी 85 साल की हैं।अमरी का निकाह पीरे का पार निवासी चिनेसर से 1926 में हुआ था।यह गांव भारत पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में चला गया।आजादी के बाद से हमला अपनी बेटी से नहीं मिला।हमला तीन बेटिया अमरीएहनु और सईदा हैं वहीं तीन पुत्र हैजम,जूमा और आदम हैं ।सबसे बडे पुत्र हैजम की उम्र भी इस वक्त 82 साल हैं।हमला का पड पोता अरबाब 23 साल का हैं।उसका भी निकाह हो रखा है।हमला नें अपनी लम्बी उम्र का राज बताते हूए कहा कि बाडमेर विभाजन से पहले अरब जानें का एक मात्र व्यापारिक रास्ता था।खाने की खूब सामग्री आती थी।खाना शुद्ध होता था।दूध,दही,छाछ,बाजरी , की रोटी या राब खाते नशा नहीं था।उसने बताया कि वह किसी के घर पानी भी नही पीता था।40 की उम्र में निकाह हुआ था।हमला की शरीक ए हयात की 22 साल पहले मृत्यु हो चुकी हैं।हमला ने बताया कि अब उम्र के इस पडाव में काफी कमजोर महसूस कर रहा हैं।हमला का लम्बा चौडा परिवार हैं।इस परिवार में लगभग 253 सदस्य हैं।मजे कि बात हैं कि हमला को वृद्धावस्था पेंशन तक नही मिलती।सरकारी सुविया का तनिक लाभ हमला या उसके परिवार को नही मिला।पूरे क्षैत्र में ईमानदारी के लिऐं हमला जाना जाता हैं।हमला अपना रोजमर्रा का काम काज खुद निपटाता हैं।उसकी इच्छा हें कि 125 वीं सालगिरह पर ख्वाजा साहब की दरगाह की जियारत करें इसके बाद उसे जीने की इच्छा नही।क्षैत्रीय विधायक और पंचायत राज्य मंत्री अमीन खान की माता फातिमा 106 साल की उम्र में दुरूस्त हैं।जिला प्रशासन द्धारा क्षैत्र के इन शतकवीर बुजुर्गो की उपेक्षा की जा रही हैं।जिला कलेक्टर गौरव गोयल नें बताया कि मुझे इन बुजुर्गो के बारे में जानकारी आपसे मिली हे।प्रशासन की ओर से इन्हें पूरा मान सम्मान दिया जाऐंगा।सरकारी सुविधा योग्य हैं,तों नियमानुसार लाभ दिलाया जाएगा।
कॉमन गेम्स: गज़ब खेल
प्रिंसीपल माता हरकी देवी महिला कॉलेज, औढां
कॉमनवेल्थ गेम्स में से वैल्थ तो चला गया है और अब कॉमन गेम्स रह गई हैं। वैसे सबसे कॉमन गेम यही है कि जितना हो सके मिलजुल कर वैल्थ चाट लो। अकेली अंगुली रोटी का गस्सा तक नहीं तोड़ सकती। रोटी खाने के लिये सारी अंगुलियों को इकट्ठे होना ही पड़ता है। उसी प्रकार किसी भी परियोजना या खजाने से धन लूटने के लिये सांझा कोशिश करनी पड़ती है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। कॉमनवेल्थ गेम्स इसका ज्वलन्त प्रमाण है। अधिकरी, कर्मचारी, नेता, मंत्री, व्यवसायी, उद्योगपति, विदेशी कम्पनियां आदि सभी की मिलीभगत से करोड़ों हड़पे जा चुके हैं। देशप्रेमी लोगों का कहना है कि किसने कितना खाया या लुटाया इसका फैसला खेल होने के बाद कर लेना चाहिए। अभी देश की बदनामी हो रही है। अरे वाह! अजीब देशप्रेम है। वे यह क्यूं नहीं कहते कि जब चोर रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं तो उधेड़ दो उनको, खींच लो खाल। उनके हाथ में यदि इन खेलोें की डोर कुछ दिन और रह गई तो वे बचाखुचा भी निगल लेंगे और ऐसे छिद्र भी ढूंढ लेंगे जिन जिनमें से बच कर निकलने में सुविधा रहेगी। मेरे मन में तो मीडिया के लिये हार्दिक शाबाशी उमड़ रही है कि जिनके प्रयासों से कॉमनवेल्थ की सच्चाई सामने आई है। वरना आम आदमी को तो पता ही ना चलता कि किस तरह खेल-खेल में खा लिया। रही बात बदनामी की। वह तो होनी चाहिए बल्कि जिन लोगों ने खाया है, उनके नाम जगह-जगह चस्पा होने चाहिएं, ठीक वैसे ही जैसे मोस्ट वांटेड के पोस्टर्स लगाये जाते हैं या जिस तरह फर्जी यूनीवर्सिटी के नाम सभी अखबारों में छापे जाते हैं। अगर हमें देशभक्ति का परिचय देना ही है तो इन खेलों के प्रति बेरुखी दिखाकर दिया जाना चाहिए। न ही तो कोई कम्पनी इनकी प्रायोजक बने और न ही कोई नागरिक इनका दर्शक बने। काश कुर्सियां खाली पड़ी रहें और आने वाले मेहमान पूछें कि कोई आया क्यूं नहीं? और फिर आयोजक शर्म से गर्दन झुकाए खड़े रह जायें। दरअसल ये खेल नहीं रहे बल्कि तमाशा बन गए हैं। जिन लोगों ने इस तमाशे की रचना की है, उन्हें यह बता दिया जाना चाहिए कि देश की आम जनता तमाशबीन बन कर नहीं रह सकती। समय रहते उनकी डुगडुगी पकड़ कर उनके ही कानों में बजा दी जाए जो खेलों के बहाने मालामाल हो गए हैं। उनका तो खेल हो गया और देश की इज्जत तार-तार हो रही है। यदि हमारे खिलाड़ी सभी मुकाबलों के स्वर्ण पदक जीत लें तब भी यह प्रतिष्ठा वापिस नहीं आ सकती क्योंकि धोखधड़ी के खेल ने सबको पछाड़ दिया है। जब खेल चलेंगे तो आम आदमी अपनी दिहाड़ी करेगा न कि विजेताओं के लिये ताली बजाएगा। वैसे भी हर किसी को पता होना चाहिए कि मैडल से ज्यादा रोटी महत्वपूर्ण है। और यह सत्य है कि रोटी के खेल में आम आदमी बुरी तरह हार रहा है।
बाल की खाल निकालें तो अपने कॉमनवेल्थ खेलों में दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ का खेल शुरू हो गया है। लोगों ने आरटीआई के माध्यम से खेलों की तह तक गोते लगा लिये हैं। हाथ में मोती तो एक नहीं आया, हां, कोयलों की कमी नहीं है। लोग रंगे हाथों नहीं बल्कि रंगे तन-मन पकड़े जा रहे हैं। नोटों के रंग में पांव से लेकर शीश तक रंगे हैं। दीमक भी किसी पेड़ को चट करने में समय लगाती होगी पर अपने आला लोगों ने नोट चटकाने का बरसों का काम मिनटों में कर दिया। उस पर तुर्रा यह कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। आयोजक एक ही रटना लगाये जा रहे हैं कि खेल-चोरों के कारनामों की पूरी जांच होगी और कोई बख्शा नहीं जायेगा के खोखले वादे किये जा रहे हैं। चोरों को भागने का पूरा टाईम दिया जा रहा है और मौका भी। बचने-बचाने की योजनायें बन रही हैं। साथ ही जो थोड़ा बहुत पैसा बचा रह गया है, उसे हड़पने के मनसूबों में भी कमी नहीं आई है। किसी ने कहा है कि जो चोर के लिय सीढ़ी पकड़ता है वो भी चोर ही होता है। यहां तो सीढ़ी पकड़ने वालों की पूरी कतार है क्योंकि सीढ़ी पकड़ने के नाम की मोटी रकम मिलती है। संयुक्त सचिव एस. कृष्णन और संयुक्त सचिव राहुल भटनागर ने कॉमनवैल्थ खेलों के नाम पर कुल 21 विदेश यात्रायें की हैं और वे भी उन देशों की जिनका इन खेलों से कोई लेना एक ना देना दो। अब कर लो इन अधिकारियों का जिसने जो करना हो। कोई हाथ तो लगाये। एक फर्रा तक भी नहीं पकड़ाया होगा इनके हाथ में। यही तो असली खेल है कि चकमा ऐसे दो कि पकड़े भी जाओ तो पकड़ में ना आओ। यही तो आपसी मेल का खेल है। इसी कारण बड़े-बड़े डिटैक्टर भी यहां फेल हैं। दरअसल हमारे उच्च अधिकारी और राजनेता चिकन घड़े हैं। उन पर तिल भर भी असर नहीं होता। इन खेलों की कामयाबी को देश की इज्जत से जोड़ कर देखा जा रहा है। इज्जत तो तार-तार हो चुकी है। हां, कुछ मैडल आ जाएंगे तो जरूर मरहम का काम करेंगे पर इसके चांसेज कम ही नज़र आ रहे हैं। फिलहाल लग तो यह रहा है कि गड़बड़झाले के इस खेल में पता नहीं कितनों का तेल निकलेगा और किस-किस की रेल बंधेगी।
भगत सिंह: एक विचारशील क्रांतिकारी
भगत सिंह को एक महान देशभक्त के रूप में याद किया जाता है किंतु वे एक महान विचारक भी थे, यह तथ्य प्राय: गौण रहा है। वास्तव में उनके विचारों ने आजादी के सही अर्थों को रेखांकित किया। वे देश की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक क्रांति का सपना संयोए थे। वे ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जो शोषण, गरीबी, अशिक्षा, जाति-संप्रदाय-रूढि़वाद से मुक्त हो। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
भगत सिंह और उनके साथियों ने 1928 में 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ में 'समाजवादी शब्द जोड़कर इतिहास को एक ऐसा मोड़ देने का प्रयत्न किया था जिसे यदि तत्कालीन राजनीतिक पार्टियों का समर्थन प्राप्त हो जाता तो देश 1947में केवल राजनीतिक आजादी हासिल करके ही चुप न बैठ जाता। आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए होते। विदेशियों की गुलामी और देश की सरकार द्वारा अपनी ही जनता पर थोपी गई समाजार्थिक गुलामी में विशेष अंतर नहीं होता। दोनों हालतों में आम आदमी की स्थिति दयनीय होती है और एक बेहतर साज की परिकल्पना आकाशकुसुम बनी रहती है।
अमृतसर में अप्रैल 1928 में 'नौजवान भारत सभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया था। भगत सिंह सभा के महासचिव थे। प्रस्ताव में कहा गया था, '....लोगों को यह महसूस कराने की जरूरत है कि भावी क्रांति का अर्थ सिर्फ शासकों की तबदीली ही नहीं होगा। सबसे बढ़कर इसका अर्थ होगा, एक बिल्कुल नए ढांचे पर एक नए राजतंत्र की स्थापना करना। यह एक दिन या एक साल का काम नहीं है। कई दशकों के महान बलिदान ही जनता को इस महान कार्य को संपन्न करने के लिए तैयार कर सकते हैं और सिर्फ क्रांतिकारी युवकों को ही इसे करना होगा। पर यह जरूरी नहीं कि बम और पिस्तौल वाला आदमी ही क्रांतिकारी हो।
इससे दो बातें बहुत साफ हो जाती हैं-एक,क्रांति का अर्थ मात्र सत्ता परिवर्तन नहीं होता। उसका लक्ष्य एक पूरी व्यवस्था को बदलना होता है। दो,भगत सिंह आतंकवादी नहीं थे-हिंसा या बम-पिस्तौल की तुलना में वे विचार को अधिक मूल्यवान और पुरअसर समझते थे। शुरू में वे जरूर रोमांटिक क्रांतिकारी रहे लेकिन अध्ययनशीलता ने उन्हें समाजवादी क्रांतिकारी बना दिया। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि क्रांति का नाटक रूमानियत के बोदे मंच पर नहीं खेला जा सकता। उसे विचार की पुख्ता धरती की जरूरत होती है।
भगत सिंह ने अपने इने-गिने वर्षों में जिंदगी और समाज के अनेक पहलुओं को गौर से उलट-पलट कर देखा। राजनीति, दर्शन, धर्म, भाषा, साहित्य, इतिहास, समाज विज्ञान आदि अनेक विषय उनके अध्ययन के केंद्र में रहे। उन्होंने न केवल इन विषयों का अध्ययन मनन किया, इन पर बहुत कुछ लिखा भी। उनका पहला लेख 'हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1923-24 में 'पंजाब की भाषा और लिपि विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता के लिए लिखा गया था। भगत सिंह उस समय नेशनल कॉलेज के विद्यार्थी थे। उनका लेख प्रतियोगिता के सर्वोत्तम लेखों में शुमार किया गया। लेख का सार यह था कि राष्ट्रीय भावना के विकास और देश की उन्नति के लिए साहित्य का विकास जरूरी है, परंतु साहित्य के लिए भाषा की जरूरत है। भगत सिंह ने राष्ट्र भाषा के महत्व को स्वतंत्रता से पूर्व ही समझ लिया था। स्वतंत्र भारत उसे आज तक नहीं समझ पाया। तभी विदेशियों से हमें यह सुनना पड़ता है कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। लेख में कहा गया, '.... समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और इसे एक राष्ट्र बनाना होगा। इसके लिए सर्वप्रथम एक भाषा का होना जरूरी है।
'किरती' के माह, जून 1928 के अंकों में उन्होंने 'सत्याग्रह, 'हड़तालें, 'धर्म और हमारी आजादी की जंगÓ आदि विषयों पर विचारोत्तेजक लेख लिखे। 'बम का दर्शन (जनवरी 1930), 'मैं नास्तिक क्यों हूं? (अक्तूबर 1930), 'ड्रीमलैंड की भूमिका (जनवरी 1931) उनके अन्य लेख हैं जो उन्हें क्रांतिकारी लेखक और विचारक का सम्मानित दर्जा देते हैं। इन्हीं दस्तावेजों के कारण देश के शहीदों की लंबी पंक्ति में वे बहुत कद्दावर हो उठते हैं और अलग ही दिखाई देते हैं।
भगत सिंह का चिंतन-मनन तर्क आधारित था। तर्कशीलता के कारण ही वे आस्तिक से नास्तिक बने। उन्होंने लिखा-'प्रचलित विश्वास की एक-एक बात को तर्क सहित परखना-छांटना होगा। अगर कोई तर्क के आधार पर किसी सिद्धांत या आदर्श में विश्वास करने लगता है तो उसका विश्वास सराहनीय है। सिर्फ विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक है, ये दिमाग को कुंद बना देते हैं।....मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रकृति को चलाने वाली परमात्मा जैसी कोई सजग सत्ता नहीं। हमारा प्रकृति पर विश्वास है और समुचित प्रगति का लक्ष्य मनुष्य का प्रकृति के ऊपर अपनी सेवा के लिए कब्जा करना है। इसके पीछे कोई सजग चालक शक्ति नहीं है।
भगत सिंह के समकालीन कांग्रेसी तथा वाम विचारधारा के नेता उनके जीवनकाल में उन्हें नहीं समझ पाए। आज भी 28 सितंबर को उनकी जयंती और 23 मार्च को उनकी शहादत की रस्म अदायगी के अलावा वे भगत सिंह के प्रति गंभीर नहीं होते। उनकी नजर से समस्याओं को नहीं देखते, उन्हें हल करने की दिशा में कदम उठाना तो दूर की बात है। हालांकि भाषा, सांप्रदायिकता, समाजिक रूढि़वाद, धार्मिक कठमुल्लापन जैसी समस्याएं आज भी उतनी जटिल हैं और गंभीर, जितनी भगत सिंह के समय में थीं। माना कि क्रांति का तत्कालीन मूल मंत्र माक्र्सवाद जिसमें भगत सिंह को पूर्ण आस्था थी आज विश्व रंगमंच के नेपथ्य में चला गया है। उसकी वापसी यदि हुई तो उसमें से बहुत कुछ थोथा उड़ चुका होगा जो माक्र्सवाद के स्वरुप को बिगाडऩे का मुख्य कारक रहा। सारहीन वस्तु को न इतिहास ग्राह्य समझता है, न कुदरत उसे संजो कर रख सकती है। लेकिन ऊपर कहे गए अनेक मुद्दों के हल के लिए भगत सिंह आज भी प्रासंगिक जान पड़ते हैं। किसी चमत्कार को उनके साथ जोड़े बिना कहा जा सकता है कि वे भविष्यदृष्टा भी थे। फांसी से पहले अपनी अंतिम भेंट में उन्होंने कहा था: 'अंग्रेज की जड़ें हिल चुकी है , वे पंद्रह साल में चले जाएंगे, समझौता हो जाएगा। पर उससे जनता का कोई लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरातफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आएगी।
उनकी भविष्यवाणी का एक-एक शब्द सही निकला। सही यह भी है कि भगत सिंह को भावना के स्तर पर याद करके हम निश्चिंत-निष्क्रिय हो उठते हैं जबकि जरूरत है विचार के धरातल पर मंथन की, अमल की। देखें समय की शिला पर भगत सिंह का नाम फिर से कौन उकेरेगा?
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